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Aatish Indori
shaam ko roz bulan
shaam ko roz bulan | शाम को रोज़ बुलंदी से उतर आते हैं
- Aatish Indori
शाम
को
रोज़
बुलंदी
से
उतर
आते
हैं
जो
परिंदे
हैं
वो
तो
लौट
के
घर
आते
हैं
उम्र
भर
साथ
निभाने
को
कोई
कहता
है
तब
मुहब्बत
में
अगर
और
मगर
आते
हैं
उनको
व्यापार
ही
व्यापार
नज़र
आता
है
लोग
जो
जिस्म
की
गलियों
से
गुज़र
आते
हैं
बे-वफ़ाओं
की
बताता
हूँ
अनूठी
पहचान
वे
ज़ियादा
ही
वफ़ादार
नज़र
आते
हैं
- Aatish Indori
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आँख
की
बेबसी
दिल
का
डर
देखना
तुम
किसी
दिन
ग़रीबों
का
घर
देखना
Alankrat Srivastava
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यूँँ
तो
वो
शख़्स
बिलकुल
बे-गुनह
है
ज़माने
की
मगर
उस
पे
निगह
है
हमारे
दरमियाँ
जो
दूरियाँ
हैं
यक़ीनन
तीसरी
कोई
वजह
है
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Dileep Kumar
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माँग
सिन्दूर
भरी
हाथ
हिनाई
करके
रूप
जोबन
का
ज़रा
और
निखर
आएगा
जिसके
होने
से
मेरी
रात
है
रौशन
रौशन
चाँद
में
आज
वही
अक्स
नज़र
आएगा
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Azhar Iqbal
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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लाई
न
ऐसों-वैसों
को
ख़ातिर
में
आज
तक
ऊँची
है
किस
क़दर
तिरी
नीची
निगाह
भी
Firaq Gorakhpuri
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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कल
रात
मैं
बहुत
ही
अलग
सा
लगा
मुझे
उसकी
नज़र
ने
यूँँ
मेरी
सूरत
खंगाली
दोस्त
Afzal Ali Afzal
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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अलग
बैठे
थे
फिर
भी
आँख
साक़ी
की
पड़ी
हम
पर
अगर
है
तिश्नगी
कामिल
तो
पैमाने
भी
आएँगे
Majrooh Sultanpuri
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तुम्हें
ज़रूर
कोई
चाहतों
से
देखेगा
मगर
वो
आँखें
हमारी
कहाँ
से
लाएगा
तुम्हारे
साथ
ये
मौसम
फ़रिश्तों
जैसा
है
तुम्हारे
बा'द
ये
मौसम
बहुत
सताएगा
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Bashir Badr
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इक
पे
टिकना
तेरी
आदत
में
नहीं
है
यह
सहूलत
पर
मुहब्बत
में
नहीं
है
आप
जब
से
जान-ए-जानाँ
बन
गए
हो
लुत्फ़
बिल्कुल
भी
मुहब्बत
में
नहीं
है
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Aatish Indori
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उसकी
चाहत
की
थाह
देखूँगा
सब
सेे
पहले
निगाह
देखूँगा
क्या
मुझे
सिर्फ़
तुम
ही
देखोगे
मैं
भी
होते
तबाह
देखूँगा
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Aatish Indori
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यहाँ
मूढ़ों
का
अब
सम्मान
थोड़ी
है
पुराने
वाला
हिंदुस्तान
थोड़ी
है
सुख़नवर
हो
मगर
एसा
लब-ओ-लहजा
वतन
है
जंग
का
मैदान
थोड़ी
है
लब-ओ-लहजे
ने
ज़ाहिर
कर
दी
सच्चाई
मुहब्बत
का
तो
यह
एलान
थोड़ी
है
ज़रूरी
चीज़
है
हो
दिल
में
मानवता
बिना
इसके
कोई
इंसान
थोड़ी
है
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Aatish Indori
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आज़मा
आज़मा
के
ये
क्या
कर
दिया
इक
वफ़ादार
को
बे-वफ़ा
कर
दिया
रास्ते
में
बियाबान
जंगल
था
जब
हम
सेफ़र
ने
मुझे
तब
जुदा
कर
दिया
उसने
मेरी
दलीलें
सुनी
ही
नहीं
हम
जुदा
होंगे
यह
फ़ैसला
कर
दिया
दूर
जाना
था
पर
बेवफ़ाई
न
की
दिल
के
बंधन
से
फ़ौरन
रिहा
कर
दिया
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Aatish Indori
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ध्यान
इतना
ज़रूर
रखते
हैं
बद-ख़यालात
दूर
रखते
हैं
नूर
हम
तो
ज़रूर
रखते
हैं
आप
पर
कोह-ए-नूर
रखते
हैं
हम
बना
लेंगे
बढ़िया
सा
माहौल
हम
भी
भाई
सुरूर
रखते
हैं
दोस्त
हम
लोग
हैं
ग़ज़ल
वाले
बोलने
का
शु'ऊर
रखते
हैं
भले
बंदूक़
लाइसेंसी
हो
लोग
कट्टा
ज़रूर
रखते
हैं
दिल
परेशान
तब
नहीं
करता
ख़ुद
को
जब
चूर-चूर
रखते
हैं
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Aatish Indori
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