shaam ko roz bulan | शाम को रोज़ बुलंदी से उतर आते हैं

  - Aatish Indori
शामकोरोज़बुलंदीसेउतरआतेहैं
जोपरिंदेहैंवोतोलौटकेघरआतेहैं
उम्रभरसाथनिभानेकोकोईकहताहै
तबमुहब्बतमेंअगरऔरमगरआतेहैं
उनकोव्यापारहीव्यापारनज़रआताहै
लोगजोजिस्मकीगलियोंसेगुज़रआतेहैं
बे-वफ़ाओंकीबताताहूँअनूठीपहचान
वेज़ियादाहीवफ़ादारनज़रआतेहैं
  - Aatish Indori
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