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Aatish Indori
ghiraunda raushni se tar nahin hai
ghiraunda raushni se tar nahin hai | घिरौंदा रौशनी से तर नहीं है
- Aatish Indori
घिरौंदा
रौशनी
से
तर
नहीं
है
किसी
दरवेश
का
ये
दर
नहीं
है
तुम्हारी
तरह
आख़िर
बन
गया
हूँ
जो
कुछ
अंदर
है
वो
बाहर
नहीं
है
मेरी
तस्वीर
में
सब
रंग
भर
दो
मेरा
दिल
दिल
ही
है
पत्थर
नहीं
है
लहू
में
घुल
गया
है
इश्क़
आतिश
दिल-ए-नादाँ
ठिकाने
पर
नहीं
है
- Aatish Indori
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ख़ाली
पड़ा
है
और
उदासी
भरा
है
दिल
सो
लोग
इस
मकान
से
आगे
निकल
गए
Ankit Maurya
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कहा
जो
कृष्ण
ने
गीता
में
रक्खेगा
अगर
तू
याद
भले
जितना
घना
जंगल
हो
पर
तू
खो
नहीं
सकता
Amaan Pathan
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मैं
बार
बार
तुझे
देखता
हूॅं
इस
डर
से
कि
पिछली
बार
का
देखा
हुआ
ख़राब
न
हो
Shaheen Abbas
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ख़मोशी
तो
यही
बतला
रही
है
उदासी
रास
मुझको
आ
रही
है
मुझे
जिन
ग़लतियों
से
सीखना
था
वही
फिर
ज़िंदगी
दोहरा
रही
है
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Vishal Singh Tabish
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
Siddharth Saaz
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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लिपट
जाते
हैं
वो
बिजली
के
डर
से
इलाही
ये
घटा
दो
दिन
तो
बरसे
Dagh Dehlvi
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कोहरा
तो
इस
उदासी
का
घना
है
और
सबका
दिल
भी
पत्थर
का
बना
है
रोने
से
मन
हल्का
होता
होगा
लेकिन
मैं
तो
लड़का
हूँ,
मुझे
रोना
मना
है
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Daqiiq Jabaali
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जाने
से
कोई
फ़र्क़
ही
उसके
नहीं
पड़ा
क्या
क्या
समझ
रहा
था
बिछड़ने
के
डर
को
मैं
Shariq Kaifi
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नहीं
ख़ुद
को
रखा
उसने
किधर
का
भी
उधर
का
भी
रहा
वो
और
इधर
का
भी
Aatish Indori
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जिसकी
जैसी
समझ
वहीं
पहुँचे
लोग
तह
तक
मगर
नहीं
पहुँचे
बेवफ़ाओं
की
बात
क्या
कीजे
वे
अभागे
कहीं
नहीं
पहुँचे
क्या
सुनाएँ
व्यथा
बुढ़ापे
की
घर
पहुँच
के
भी
घर
नहीं
पहुँचे
तोड़
कर
जिनसे
आए
थे
रिश्ते
घूम
फिर
कर
मगर
वहीं
पहुँचे
रूह
की
बात
कर
रही
थी
मैं
आप
लेकिन
सही
नहीं
पहुँचे
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Aatish Indori
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झूट
है
यह
कि
दवाओं
से
शिफ़ा
होती
है
सिर्फ़
और
सिर्फ़
दु'आओं
से
शिफ़ा
होती
है
शह्र
में
रहते
हुए
ठीक
नहीं
हो
सकते
गाँव-क़स्बों
की
हवाओं
से
शिफ़ा
होती
है
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Aatish Indori
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ज़िंदगानी
तो
ख़ैर
गुज़रेगी
पर
तुम्हारे
बग़ैर
गुज़रेगी
आपको
रंग
तो
लगाऊँगा
कल
मुहल्ले
से
ग़ैर
गुज़रेगी
सोचता
रहता
हूँ
यही
इक
बात
कैसे
तेरे
बग़ैर
गुज़रेगी
ज़ोम्बी
की
तरह
जिऊँगा
मैं
ऐसी
तेरे
बग़ैर
गुज़रेगी
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Aatish Indori
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सोचता
है
तू
आब
बरसेगा
तुझपे
ज़ालिम
अज़ाब
बरसेगा
मौसम-ए-हिज्र
और
क्या
देगा
मेरी
आँखों
से
आब
बरसेगा
चल
तुझे
आज
नींद
आएगी
तुझपे
अच्छा
सा
ख़्वाब
बरसेगा
आज
की
रात
ख़ास
है
साहब
रतजगों
पे
शबाब
बरसेगा
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Aatish Indori
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