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Aatish Indori
karta bhi kyun usse gilaa aakhir
karta bhi kyun usse gilaa aakhir | करता भी क्यूँँ उस सेे गिला आख़िर
- Aatish Indori
करता
भी
क्यूँँ
उस
सेे
गिला
आख़िर
इश्क़
तो
ठहरा
एक
जुआ
आख़िर
और
सुबकता
कितना
जिया
आख़िर
पत्थर
हुआ
मेरा
भी
हिया
आख़िर
तुम
भी
तो
बर्बाद
हुए
जानाँ
जफ़ा
से
किसका
हुआ
भला
आख़िर
ख़त-ओ-किताबत
ही
बस
जारी
थी
वो
सिलसिला
भी
ख़त्म
हुआ
आख़िर
चारा-गर
ढूँढ़
ही
नहीं
पाए
ज़ख़्म
को
ख़ुद
ही
सिलना
पड़ा
आख़िर
- Aatish Indori
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परेशाँ
है
वो
झूटा
इश्क़
कर
के
वफ़ा
करने
की
नौबत
आ
गई
है
Fahmi Badayuni
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इश्क़
में
जी
को
सब्र
ओ
ताब
कहाँ
उस
से
आँखें
लड़ीं
तो
ख़्वाब
कहाँ
Meer Taqi Meer
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यूँँ
कहें
नुमाइशों
के
दिन
क़रीब
आ
गए
महज़
फ़रवरी
हो
किस
तरह
महीना
इश्क़
का
Neeraj Neer
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अपने
इश्क़
का
यूँँ
इज़हार
करना
है
तुझ
सेे
तुझको
हाथों
से
पहनाएँगें
कानों
में
झुमके
Harsh saxena
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जबकि
मैंने
इश्क़
में
मरने
का
वा'दा
कर
लिया
तब
लगा
मुझको
कि
मैंने
इश्क़
ज़्यादा
कर
लिया
Siddharth Saaz
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ये
इश्क़
आग
है
और
वो
बदन
शरारा
है
ये
सर्द
बर्फ़
सा
लड़का
पिघलने
वाला
है
Shadab Asghar
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नींद
के
दायरे
में
हाज़िर
हूँ
ख़्वाब
के
रास्ते
में
हाज़िर
हूँ
याद
है
इश्क़
था
कभी
मुझ
सेे
मैं
उसी
सिलसिले
में
हाज़िर
हूँ
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Ejaz Tawakkal Khan
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मुझे
उस
सेे
मुहब्बत
सच
बड़ी
महँगी
पड़ेगी
अकेलेपन
से
उसने
इश्क़
ऐसा
कर
लिया
है
Anukriti 'Tabassum'
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मैं
बाल
बाल
बच
गया
हर
बार
इश्क़
से
सर
के
बहुत
क़रीब
से
पत्थर
गुज़र
गए
Umair Najmi
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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मेरी
दीवानगी
से
वो
ख़फ़ा
था
सफ़र
में
साथ
छोड़ेगा
पता
था
Aatish Indori
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यार
तुम
बद-नसीब
कैसे
हो
बाप
है
फिर
गरीब
कैसे
हो
आप
अटके
शिया
और
सुन्नी
में
फिर
ख़ुदा
के
क़रीब
कैसे
हो
ख़ुद
की
थाली
में
छेद
कर
डाला
यार
इतने
अजीब
कैसे
हो
बूढ़े
बरगद
की
छाँव
में
हो
तुम
बेटे
फिर
ग़म-नसीब
कैसे
हो
तुम
सेे
पूरी
हुई
कहानी
यह
दोस्त
हो
तुम
रक़ीब
कैसे
हो
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Aatish Indori
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जान-ए-जाँ
तुझको
मुयस्सर
हूँ
मैं
आसानी
से
इसलिए
मेरी
कोई
क़द्र
नहीं
है
शायद
Aatish Indori
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ख़ाक
दिन
अच्छे
बाद
में
निकले
हिज्र
के
दिन
विषाद
में
निकले
हम
वे
हैं
जिनको
इश्क़
पहले
हुआ
मूँछ
के
बाल
बाद
में
निकले
कुछ
दिनों
तक
तो
ठीक
था
सब
कुछ
हिज्र
के
दर्द
बाद
में
निकले
ढूँढा
तो
अच्छा
लड़का
ही
था
पर
ऐब
सारे
दमाद
में
निकले
कोई
बेटा
न
था
तो
यूँँ
हुआ
है
बेटे
के
गुण
दामाद
में
निकले
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Aatish Indori
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याद
आ
जाती
है
और
रात
बिगड़
जाती
है
बनने
वाली
थी
जो
वो
बात
बिगड़
जाती
है
याद
रखना
कि
बुरा
होता
है
मुँह-फट
होना
ज़िंदगी
भर
के
लिए
बात
बिगड़
जाती
है
सोचते
यह
हैं
कि
ता-उम्र
रहेंगे
मिल
के
वक़्त
के
साथ
मगर
बात
बिगड़
जाती
है
यह
कोई
पहली
दफ़ा
थोड़ी
हुआ
है
जानाँ
हर
दफ़ा
मेरी
बनी
बात
बिगड़
जाती
है
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Aatish Indori
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