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Aatish Indori
yaar tum bad-naseeb kaise ho
yaar tum bad-naseeb kaise ho | यार तुम बद-नसीब कैसे हो
- Aatish Indori
यार
तुम
बद-नसीब
कैसे
हो
बाप
है
फिर
गरीब
कैसे
हो
आप
अटके
शिया
और
सुन्नी
में
फिर
ख़ुदा
के
क़रीब
कैसे
हो
ख़ुद
की
थाली
में
छेद
कर
डाला
यार
इतने
अजीब
कैसे
हो
बूढ़े
बरगद
की
छाँव
में
हो
तुम
बेटे
फिर
ग़म-नसीब
कैसे
हो
तुम
सेे
पूरी
हुई
कहानी
यह
दोस्त
हो
तुम
रक़ीब
कैसे
हो
- Aatish Indori
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उसको
जो
कुछ
भी
कहूँ
अच्छा
बुरा
कुछ
न
करे
यार
मेरा
है
मगर
काम
मेरा
कुछ
न
करे
दूसरी
बार
भी
पड़
जाए
अगर
कुछ
करना
आदमी
पहली
मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
न
करे
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Abid Malik
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अब
कारगह-ए-दहर
में
लगता
है
बहुत
दिल
ऐ
दोस्त
कहीं
ये
भी
तिरा
ग़म
तो
नहीं
है
Majrooh Sultanpuri
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ख़ुद
को
शीशा
कर
लिया
है
यार
मैंने
अब
तो
तेरा
देखना
बनता
है
मुझ
को
Neeraj Neer
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एक
आवाज़
पे
आ
जाती
है
दौड़ी
दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान
नहीं
देखती
है
दोस्ती
दोस्ती
होती
है
तुम्हें
इल्म
नहीं
दोस्ती
फ़ाइदा
नुक़सान
नहीं
देखती
है
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Aadil Rasheed
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ज़रा
विसाल
के
बाद
आइना
तो
देख
ऐ
दोस्त
तिरे
जमाल
की
दोशीज़गी
निखर
आई
Firaq Gorakhpuri
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यार
भी
राह
की
दीवार
समझते
हैं
मुझे
मैं
समझता
था
मेरे
यार
समझते
हैं
मुझे
Shahid Zaki
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अब
वो
तितली
है
न
वो
उम्र
तआ'क़ुब
वाली
मैं
न
कहता
था
बहुत
दूर
न
जाना
मिरे
दोस्त
Faisal Ajmi
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दाग़
दुनिया
ने
दिए
ज़ख़्म
ज़माने
से
मिले
हम
को
तोहफ़े
ये
तुम्हें
दोस्त
बनाने
से
मिले
Kaif Bhopali
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फ़िराक़-ए-यार
ने
बेचैन
मुझ
को
रात
भर
रक्खा
कभी
तकिया
इधर
रक्खा
कभी
तकिया
उधर
रक्खा
Ameer Minai
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ग़रज़
कि
काट
दिए
ज़िंदगी
के
दिन
ऐ
दोस्त
वो
तेरी
याद
में
हों
या
तुझे
भुलाने
में
Firaq Gorakhpuri
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मेरी
दीवानगी
से
वो
ख़फ़ा
था
सफ़र
में
साथ
छोड़ेगा
पता
था
Aatish Indori
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क़ैस-ओ-लैला
का
ज़माना
यूँँ
तो
दीवाना
है
पर
मोहब्बत
पे
बड़ी
सख़्ती
है
जुर्माना
है
Aatish Indori
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एक
मुद्दत
वो
निगाहों
में
रहा
बाद
में
वो
मेरी
आहों
में
रहा
बेवफ़ाई
करना
आदत
हो
गई
ज़िंदगी
भर
वो
गुनाहों
में
रहा
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Aatish Indori
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रेलगाड़ी
की
तरह
हम
हैं
गुज़रने
वाले
अब
नहीं
हम
तेरे
कहने
पे
ठहरने
वाले
एक
तो
हम
नहीं
सद
में
से
उबरने
वाले
दूसरा
यह
है
कि
जल्दी
नहीं
मरने
वाले
रेलगाड़ी
से
ही
देखेंगे
तेरे
शहर
को
हम
नहीं
गलियों
में
तेरी
फिर
से
विचरने
वाले
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Aatish Indori
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भरता
कोई
नहीं
बस
रीत
रहा
है
जीवन
प्यासा-प्यासा
तेरे
बिन
बीत
रहा
है
जीवन
हौसला
जुट
रहा
लहरों
की
सदाएँ
सुनकर
धीरे-धीरे
ही
सही
जीत
रहा
है
जीवन
मौसम-ए-हिज्र
भी
हँस
के
है
बिताया
हमने
इसलिए
एक
मधुर
गीत
रहा
है
जीवन
पत्थरों
से
पटी
धरती
पे
उगे
हैं
अंकुर
पत्थरों
को
हरा
के
जीत
रहा
है
जीवन
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Aatish Indori
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