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Shubham Rai 'shubh'
bura ho vaqt to insaan bhi KHaamosh ho jaata
bura ho vaqt to insaan bhi KHaamosh ho jaata | बुरा हो वक़्त तो इंसान भी ख़ामोश हो जाता
- Shubham Rai 'shubh'
बुरा
हो
वक़्त
तो
इंसान
भी
ख़ामोश
हो
जाता
सही
से
ज़िंदगी
का
अर्थ
तो
तकलीफ़
समझाता
- Shubham Rai 'shubh'
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तुम्हारे
बाद
ये
दुख
भी
तो
सहना
पड़
रहा
है
किसी
के
साथ
मजबूरी
में
रहना
पड़
रहा
है
Ali Zaryoun
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चले
जाओ
भी
अब
जी
लेंगे
पर
सच
कहो
मजबूरी
है
क्या
मुझे
ये
कहानी
कुछ
और
लिखनी
थी
तुम्हारे
हिसाब
से
पूरी
है
क्या
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Zubair Ali Tabish
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उसको
भी
उसकी
बाँहों
में
सोना
होगा
सोना
ही
है
रिश्तों
की
भी
मजबूरी
है
Umesh Maurya
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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कब
तुम्हें
इश्क़
पे
मजबूर
किया
है
हमने
हम
तो
बस
याद
दिलाते
हैं
चले
जाते
हैं
Abbas Tabish
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कभी
पहले
नहीं
था
जिस
क़दर
मजबूर
हूँ
मैं
आज
नज़र
आऊँ
न
ख़ुद
क्या
तुम
सेे
इतना
दूर
हूँ
मैं
आज
तुम्हारे
ज़ख़्म
को
ख़ाली
नहीं
जाने
दिया
मैंने
तुम्हारी
याद
में
ही
चीख़
के
मशहूर
हूँ
मैं
आज
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SHIV SAFAR
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इलाज
ये
है
कि
मजबूर
कर
दिया
जाऊँ
वगरना
यूँँ
तो
किसी
की
नहीं
सुनी
मैंने
Jaun Elia
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दुखी
रहने
की
आदत
यूँंँ
बना
ली
है
कि
अब
कोई
ख़ुशी
का
ज़िक्र
भी
कर
दे
तो
फिर
तकलीफ़
होती
है
Dipendra Singh 'Raaz'
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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ऐसे
हालात
से
मजबूर
बशर
देखे
हैं
अस्ल
क्या
सूद
में
बिकते
हुए
घर
देखे
हैं
हमने
देखा
है
वज़ादार
घरानों
का
जवाल
हमने
सड़कों
पे
कई
शाह
ज़फ़र
देखे
है
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Mehshar Afridi
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उस
झरोखे
से
मुझको
इशारा
हुआ
करता
था
जब
मैं
लड़का
बहुत
सीधा-सादा
हुआ
करता
था
एक
लड़की
थी
जो
मुस्कुराते
हुए
दिखती
थी
जब
भी
कक्षा
में
चर्चा
हमारा
हुआ
करता
था
दोस्तों
में
बहुत
मिलता
था
मान
सम्मान
पर
टीचरों
की
नज़र
में
नकारा
हुआ
करता
था
अच्छे
अच्छे
उतर
आए
हैं
अपनी
औक़ात
पर
जिनसे
अपना
कभी
भाई
चारा
हुआ
करता
था
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Shubham Rai 'shubh'
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अपने
पे
जो
आऊँगा
किसी
दिन
फिर
तुमको
भुलाऊँगा
किसी
दिन
पागल
जो
समझ
रही
ये
दुनिया
पागल
ही
बनाऊँगा
किसी
दिन
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Shubham Rai 'shubh'
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बिछती
नहीं
पलकें
जहाँ
अपना
तुम्हारा
होता
है
इच्छाएँ
जब
जब
बढ़ती
हैं
तब
तब
ख़सारा
होता
है
Shubham Rai 'shubh'
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मुहब्बत
में
कई
ऐसे
भी
सौदे
कर
गया
हूँ
मैं
हक़ीक़त
जान
के
जिसकी
बहुत
ही
डर
गया
हूँ
मैं
मिला
जो
भी
भरोसा
कर
लिया
उस
पे
ऐ
जान-ए-जाँ
नहीं
करना
था
जो
मुझको
वही
तो
कर
गया
हूँ
मैं
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Shubham Rai 'shubh'
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प्रेम
होता
बुरा
तो
जताते
नहीं
पास
चलकर
के
तुम
भी
तो
आते
नहीं
राम
को
जानकी
प्रिय
न
होती
अगर
सिंधु
के
बीच
पुल
फिर
बनाते
नहीं
भाव
ही
देखते
है
सभी
का
प्रभु
वर्ना
शबरी
के
झूठन
वो
खाते
नहीं
चाहते
वो
कि
माया
में
उलझे
रहो
पाठ
गीता
का
फिर
वो
सुनाते
नहीं
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Shubham Rai 'shubh'
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