hi
0
Search
Shayari
Writers
Events
Blog
Store
Help
Login
By:
00:00/00:00
Gulshan
kisi saanche men dhale tum bhi nahin
kisi saanche men dhale tum bhi nahin | किसी साँचे में ढले तुम भी नहीं
- Gulshan
किसी
साँचे
में
ढले
तुम
भी
नहीं
हम
बुरे
हैं
तो
भले
तुम
भी
नहीं
हिज्र
की
आग
क़यामत
थी
मगर
बच
गए
हम
भी
जले
तुम
भी
नहीं
हम
भी
मजबूर
अना
के
हाथों
दो
क़दम
साथ
चले
तुम
भी
नहीं
सिर्फ़
हम
से
ही
वफ़ा
की
उम्मीद
ऐसे
नाज़ों
के
पले
तुम
भी
नहीं
हम
भी
मुरझा
गए
तुम
बिन
'गुलशन'
हिज्र
में
फूले
फले
तुम
भी
नहीं
- Gulshan
Download Ghazal Image
मोहब्बत
नेक-ओ-बद
को
सोचने
दे
ग़ैर-मुमकिन
है
बढ़ी
जब
बे-ख़ुदी
फिर
कौन
डरता
है
गुनाहों
से
Arzoo Lakhnavi
Send
Download Image
24 Likes
मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
Send
Download Image
48 Likes
अगर
तुम्हारी
अना
ही
का
है
सवाल
तो
फिर
चलो
मैं
हाथ
बढ़ाता
हूँ
दोस्ती
के
लिए
Ahmad Faraz
Send
Download Image
47 Likes
निगल
ही
चुका
था
जफ़ा
का
निवाला
अना
फिर
तमाशा
नया
कर
रही
है
Amaan Pathan
Send
Download Image
5 Likes
ज़िंदा
रहने
की
ये
तरक़ीब
निकाली
हमने
बात
बिगड़ी
हुई
कुछ
ऐसे
सँभाली
हमने
उस
सेे
समझौता
किया
है
उसी
की
शर्तों
पे
जान
भी
बच
गई
इज़्ज़त
भी
बचा
ली
हमने
Read Full
Divyansh Shukla
Send
Download Image
6 Likes
तेरी
ख़ता
नहीं
जो
तू
ग़ुस्से
में
आ
गया
पैसे
का
ज़ो'म
था
तेरे
लहजे
में
आ
गया
सिक्का
उछालकर
के
तेरे
पास
क्या
बचा
तेरा
ग़ुरूर
तो
मेरे
काँसे
में
आ
गया
Read Full
Mehshar Afridi
Send
Download Image
73 Likes
बे-ख़ुदी
ले
गई
कहाँ
हम
को
देर
से
इंतिज़ार
है
अपना
Meer Taqi Meer
Send
Download Image
39 Likes
कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
Read Full
Kazim Rizvi
Send
Download Image
6 Likes
दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
Send
Download Image
22 Likes
ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
Send
Download Image
465 Likes
Read More
मैं
अपने
ज़ख़्म
गर
दिखा
दूँ
ना
तो
तुम
भी
इश्क़
से
तौबा
कर
लो
Gulshan
Send
Download Image
12 Likes
तुम
समुंदर
की
बात
करते
हो
यहाँ
आँखों
से
दरिया
बहता
है
Gulshan
Send
Download Image
12 Likes
उसकी
यादों
को
दरगुज़र
करके
मर
ना
जाऊँँ
मैं
अब
बिछड़
करके
Gulshan
Send
Download Image
13 Likes
बे-ख़याली
में
हम
भी
कहाँ
आ
गए
छोड़
पीछे
तुम्हारे
जहाँ
आ
गए
अब
बुलाना
नहीं
याद
आना
नहीं
फ़ासले
अब
बहुत
दरमियाँ
आ
गए
अब
कोई
आरज़ू
या
गुज़ारिश
नहीं
मोल
इसका
नहीं
हम
कहाँ
आ
गए
जिस्म
की
हद
के
बाहर
निकल
कर
जहाँ
रूह
रौशन
हुई
हम
वहाँ
आ
गए
Read Full
Gulshan
Download Image
2 Likes
काश
मैं
ये
कमाल
कर
जाता
तेरे
दिल
से
भी
मैं
उतर
जाता
देख
लेते
अगर
वो
मेरी
तरफ़
जाम
ख़ाली
था
मेरा
भर
जाता
तू
अगर
करती
रहनुमाई
मेरी
तू
जिधर
जाती
मैं
उधर
जाता
देखकर
मेरे
दिल
के
ज़ख़्मों
को
मैं
तो
ज़िंदा
हूँ
वो
तो
मर
जाता
Read Full
Gulshan
Download Image
4 Likes
Read More
Akbar Allahabadi
Krishna Bihari Noor
Shariq Kaifi
Mohammad Alvi
Anjum Rehbar
Abhishar Geeta Shukla
Ali Zaryoun
Zehra Nigaah
Amjad Islam Amjad
Asad Bhopali
Get Shayari on your Whatsapp
Maut Shayari
Wada Shayari
Raaz Shayari
Propose Shayari
Father Shayari