ye duniya baatone ka gham kahaan samjhti hai | ये दुनिया बाटने का ग़म कहाँ समझती है

  - SHIV SAFAR
येदुनियाबाटनेकाग़मकहाँसमझतीहै
जोहाथभरहैबचीवोदुकाँसमझतीहै
मैंपढ़रहाथायारोयाहूँरातभरजगके
येआँखेंलालहुईंकैसेमाँसमझतीहै
वतनयादेशकहोयाकिमुल्कभीइसको
ज़मींयेमाँकीतरहहरज़बाँसमझतीहै
डुबोकेयादोंमेंआँसूनिकाललेतीहै
येरातआँखोंकोमेरीकुआँसमझतीहै
चलीगईयूँँढहाकेमेरेसभीअरमाँ
वोमेरेदिलकोभीखंडरमकाँसमझतीहै
मेरेबुलातेहीसजदेमेंबैठजातीहै
उसेपुकारताहूँतोअज़ाँसमझतीहै
  - SHIV SAFAR
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