ghar men baithe baithe akshar yuñ hi nahin main thakta hooñ | घर में बैठे बैठे अक्सर यूँँ ही नहीं मैं थकता हूँ

  - SHIV SAFAR
घरमेंबैठेबैठेअक्सरयूँँहीनहींमैंथकताहूँ
मनहीमनमीलोंचलताहूँमनहीमनकुछबकताहूँ
उम्र-ए-सफ़रमेंनहींहूँतन्हाख़ुदकोयेसमझानेको
पीछेमुड़केअपनेहीक़दमोंकेनिशाँकोतकताहूँ
नज़रोंकेआगेअपनोंकीसूरतफिरनेलगतीहै
वरनाग़मइतनेहैंकिमैंअबख़ुदसेभीमरसकताहूँ
लोगकरेंअन-देखापरख़ुदमुझकोहीदिखजाताहै
चाहेजितनीख़ूबीसेमैंख़ामीअपनीढकताहूँ
सुनारमेराजानेकबतकमुझकोज़ेवरमेंढालेगा
कलभीआगमेंपकताथामैंआजभीआगमेंपकताहूँ
प्यारमेंहासिलक्याहोताहैमुझकोमतबतलाओतुम
दिलदुखनेकाडरहैवरनामैंभीयेकरसकताहूँ
इतनाभीबे-मिस्लमुझेकरनेकीज़िदक्याथीयारब
बातभीकोईकरतानहींमैंऐसाभीक्यायकताहूँ
  - SHIV SAFAR
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