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shaan manral
man ke haare hue insaan ko husn-e-shay se
man ke haare hue insaan ko husn-e-shay se | मन के हारे हुए इंसान को हुस्न-ए-शय से
- shaan manral
मन
के
हारे
हुए
इंसान
को
हुस्न-ए-शय
से
कोई
मतलब
नहीं
कोई
भी
सरोकार
नहीं
- shaan manral
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इंसाँ
की
ख़्वाहिशों
की
कोई
इंतिहा
नहीं
दो
गज़
ज़मीं
भी
चाहिए
दो
गज़
कफ़न
के
बाद
Kaifi Azmi
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इक
आदमी
जो
घर
पे
कभी
हँसता
ही
नहीं
पकड़ा
गया
है
हँसता
हुआ
कैमरे
के
साथ
Shadab khan
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नस्ल-ए-आदम
रफ़्ता
रफ़्ता
ख़ुद
को
कर
लेगी
तबाह
इतनी
सख़्ती
से
क़यामत
पेश
आएगी
न
पूछ
Abhinandan pandey
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उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी
से
अंजुम
सह
में
जाते
हैं
कि
ये
टूटा
हुआ
तारा
मह-ए-कामिल
न
बन
जाए
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Allama Iqbal
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देख
कर
इंसान
की
बेचारगी
शाम
से
पहले
परिंदे
सो
गए
Iffat Zarrin
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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संग-ए-मरमर
की
मूरत
नहीं
आदमी
इस
क़दर
ख़ूब-सूरत
नहीं
आदमी
चंद
क़िस्सों
की
दरकार
है
बस
इसे
आदमी
की
ज़रूरत
नहीं
आदमी
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anupam shah
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इसी
लिए
तो
यहाँ
अब
भी
अजनबी
हूँ
मैं
तमाम
लोग
फ़रिश्ते
हैं
आदमी
हूँ
मैं
Bashir Badr
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मोहब्बत
एक
ख़ुशबू
है
हमेशा
साथ
चलती
है
कोई
इंसान
तन्हाई
में
भी
तन्हा
नहीं
रहता
Bashir Badr
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कोई
हादसा
लेकर
आदमी
किधर
जाए
आदमी
अगर
कह
दे
हादसा
उदासी
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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अपनी
आँखें
भिगो
नहीं
सकता
और
मायूस
हो
नहीं
सकता
अब
उन्हें
भूलना
ज़रूरी
है
ज़िंदगी
भर
मैं
रो
नहीं
सकता
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shaan manral
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कब
तक
शदीद
दर्द
उठाए
फिरेंगे
हम
अब
ख़ुशियों
के
कपाट
को
खुल
जाना
चाहिए
shaan manral
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इस
वक़्त
तिरा
हाथ
मिरे
हाथ
में
है
तो
लगता
है
कि
तक़दीर
मिरे
साथ
खड़ी
है
shaan manral
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आप
नाहक़
ही
ज़ुल्म
ढाते
हैं
और
हम
हैं
कि
मुस्कुराते
हैं
तीर
पे
तीर
छोड़ते
हैं
आप
फिर
जिगर
को
भी
आज़माते
हैं
आप
हैं
ला-जवाब
शा'इर
दोस्त
हर
किसी
को
पसंद
आते
हैं
मौसमों
की
ललक
में
क्या
रोना
ये
तो
आते
हैं
और
जाते
हैं
ज़ख़्म
तो
भर
गए
सभी
ऐ
दिल
चल
नया
एक
ज़ख़्म
खाते
हैं
पाप
का
मैल
मन
से
धोने
को
लोग
गंगा
में
जा
नहाते
हैं
ये
कहानी
भी
ख़ूब
है
अपनी
आँख
में
अश्क
झिलमिलाते
हैं
काम
कितने
ही
रह
गए
बाक़ी
आप
'शेखर'
ग़ज़ल
सुनाते
हैं
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shaan manral
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इक
बशर
का
ही
ख़्वाब
है
सारा
इस
से
बढ़कर
के
ज़िंदगी
क्या
है
shaan manral
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