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Shadab khan
ik aadmi jo ghar pe kabhi hansta hi nahin
ik aadmi jo ghar pe kabhi hansta hi nahin | इक आदमी जो घर पे कभी हँसता ही नहीं
- Shadab khan
इक
आदमी
जो
घर
पे
कभी
हँसता
ही
नहीं
पकड़ा
गया
है
हँसता
हुआ
कैमरे
के
साथ
- Shadab khan
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सब
से
पुर-अम्न
वाक़िआ
ये
है
आदमी
आदमी
को
भूल
गया
Jaun Elia
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देखें
क़रीब
से
भी
तो
अच्छा
दिखाई
दे
इक
आदमी
तो
शहर
में
ऐसा
दिखाई
दे
Zafar Gorakhpuri
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मैं
तुझे
खो
के
भी
ज़िंदा
हूँ
ये
देखा
तूने
किस
क़दर
हौसला
हारे
हुए
इंसान
में
है
Abbas Tabish
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बस-कि
दुश्वार
है
हर
काम
का
आसाँ
होना
आदमी
को
भी
मुयस्सर
नहीं
इंसाँ
होना
Mirza Ghalib
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जो
मेरे
साथ
मोहब्बत
में
हुई
आदमी
एक
दफा
सोचेगा
रात
इस
डर
में
गुजारी
हमने
कोई
देखेगा
तो
क्या
सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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हर
आदमी
में
होते
हैं
दस
बीस
आदमी
जिस
को
भी
देखना
हो
कई
बार
देखना
Nida Fazli
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ठहाका
मार
कर
हथियार
हँसते
नहीं
जीतेंगे
अब
इंसान
हम
सेे
Umesh Maurya
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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वो
मुझ
को
छोड़
के
जिस
आदमी
के
पास
गया
बराबरी
का
भी
होता
तो
सब्र
आ
जाता
Parveen Shakir
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तुम्हारी
ज़िंदगी
में
तुम
हमेशा
मुझे
हर
आदमी
में
सुन
सकोगी
सुनोगी
जब
कभी
भी
शे'र
मेरे
तो
ख़ुद
को
शा'इरी
में
सुन
सकोगी
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Sanskar 'Sanam'
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मुनफ़रिद
ख़ुशबू
है
इस
शजर
की
ऐसा
लगता
है
उसने
छुआ
हो
Shadab khan
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जिसके
साथ
थोड़ा
भी
लगाव
किया
उसके
होंठ
पर
गहरा
सा
घाव
किया
Shadab khan
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हल्के
हल्के
ही
से
तेरा
जुनून
निकलेगा
फिर
भी
आई
याद
अब
आँखों
से
ख़ून
निकलेगा
Shadab khan
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मुहब्बत
में
ख़सारे
हो
रहे
हैं
चुनाँचे
हम
तुम्हारे
हो
रहे
हैं
सुना
था
इश्क़
में
होता
है
ऐसा
मेरे
भी
अब
जगारे
हो
रहे
हैं
दुपट्टे
से
ज़रा
ढक
लो
ये
चेहरा
परेशाँ
सब
सितारे
हो
रहे
हैं
फ़क़त
तेरी
कमी
है
ज़िन्दगी
में
वगरना
काम
सारे
हो
रहे
हैं
जिन्हें
नफ़रत
थी
मेरे
नाम
से
भी
वही
सब
अब
हमारे
हो
रहे
हैं
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Shadab khan
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वो
बिछड़ने
पे
भी
दिखाई
दे
इश्क़
ऐसी
नहीं
रिहाई
दे
छू
ले
गर
वो
मैं
ठीक
हो
जाऊँ
जाने
क्यूँ
हफ्तों
तक
दवाई
दे
घंटों
ख़ामोश
फोन
पर
हो
तुम
बात
क्लियर
मुझे
सुनाई
दे
ज़ख़्म
की
देख
भाल
क्यूँ
हो
अब
इक
भरे
दूसरा
दुहाई
दे
कौन
देता
ग़रीब
को
इज़्ज़त
तू
अमीरों
को
ही
बधाई
दे
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Shadab khan
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