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Shadab khan
halke halke hi se teraa junoon niklega
halke halke hi se teraa junoon niklega | हल्के हल्के ही से तेरा जुनून निकलेगा
- Shadab khan
हल्के
हल्के
ही
से
तेरा
जुनून
निकलेगा
फिर
भी
आई
याद
अब
आँखों
से
ख़ून
निकलेगा
- Shadab khan
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मेरी
अक्ल-ओ-होश
की
सब
हालतें
तुमने
साँचे
में
जुनूँ
के
ढाल
दी
कर
लिया
था
मैंने
अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुमने
फिर
बाँहें
गले
में
डाल
दी
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Jaun Elia
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कमी
न
की
तिरे
वहशी
ने
ख़ाक
उड़ाने
में
जुनूँ
का
नाम
उछलता
रहा
ज़माने
में
Firaq Gorakhpuri
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कुछ
न
मैं
समझा
जुनून
ओ
इश्क़
में
देर
नासेह
मुझ
को
समझाता
रहा
Meer Taqi Meer
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भोले
बन
कर
हाल
न
पूछ
बहते
हैं
अश्क
तो
बहने
दो
जिस
से
बढ़े
बेचैनी
दिल
की
ऐसी
तसल्ली
रहने
दो
Arzoo Lakhnavi
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ख़ुदा
बचाए
तिरी
मस्त
मस्त
आँखों
से
फ़रिश्ता
हो
तो
बहक
जाए
आदमी
क्या
है
Khumar Barabankvi
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नश्शा-हा
शादाब-ए-रंग-ओ-साज़-हा
मस्त-ए-तरब
शीशा-ए-मय
सर्व-ए-सब्ज़-ए-जू-ए-बार-ए-नग़्मा
है
Mirza Ghalib
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मेरे
जुनूँ
का
नतीजा
ज़रूर
निकलेगा
इसी
सियाह
समुंदर
से
नूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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पहले
कहता
है
जुनूँ
उसका
गिरेबान
पकड़
फिर
मेरा
दिल
मुझे
कहता
है
इधर
कान
पकड़
ऐसी
वहशत
भी
न
हो
घर
के
दरो
बाम
कहें
कोई
आवाज़
ही
ले
आ
कोई
मेहमान
पकड़
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Azbar Safeer
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ऐ
मिरी
ज़ात
के
सुकूँ
आ
जा
थम
न
जाए
कहीं
जुनूँ
आ
जा
इस
से
पहले
कि
मैं
अज़िय्यत
में
अपनी
आँखों
को
नोच
लूँ
आ
जा
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Fareeha Naqvi
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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वो
बिछड़ने
पे
भी
दिखाई
दे
इश्क़
ऐसी
नहीं
रिहाई
दे
छू
ले
गर
वो
मैं
ठीक
हो
जाऊँ
जाने
क्यूँ
हफ्तों
तक
दवाई
दे
घंटों
ख़ामोश
फोन
पर
हो
तुम
बात
क्लियर
मुझे
सुनाई
दे
ज़ख़्म
की
देख
भाल
क्यूँ
हो
अब
इक
भरे
दूसरा
दुहाई
दे
कौन
देता
ग़रीब
को
इज़्ज़त
तू
अमीरों
को
ही
बधाई
दे
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Shadab khan
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जिसके
साथ
थोड़ा
भी
लगाव
किया
उसके
होंठ
पर
गहरा
सा
घाव
किया
Shadab khan
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ये
और
बात
है
तू
खाता
रहा
क़सम
अफ़सोस
अब
भरोसा
लेकिन
नहीं
रहा
Shadab khan
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कौन
देता
ग़रीब
को
इज़्ज़त
तू
अमीरों
को
ही
बधाई
दे
Shadab khan
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इतनी
रोटियाँ
खाता
नहीं
हूँ
मैं
अब
जितना
याद
भी
ख़ूँ
माँगती
है
ये
अब
Shadab khan
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