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shaan manral
aap naahak hi zulm dhhaate hain
aap naahak hi zulm dhhaate hain | आप नाहक़ ही ज़ुल्म ढाते हैं
- shaan manral
आप
नाहक़
ही
ज़ुल्म
ढाते
हैं
और
हम
हैं
कि
मुस्कुराते
हैं
तीर
पे
तीर
छोड़ते
हैं
आप
फिर
जिगर
को
भी
आज़माते
हैं
आप
हैं
ला-जवाब
शा'इर
दोस्त
हर
किसी
को
पसंद
आते
हैं
मौसमों
की
ललक
में
क्या
रोना
ये
तो
आते
हैं
और
जाते
हैं
ज़ख़्म
तो
भर
गए
सभी
ऐ
दिल
चल
नया
एक
ज़ख़्म
खाते
हैं
पाप
का
मैल
मन
से
धोने
को
लोग
गंगा
में
जा
नहाते
हैं
ये
कहानी
भी
ख़ूब
है
अपनी
आँख
में
अश्क
झिलमिलाते
हैं
काम
कितने
ही
रह
गए
बाक़ी
आप
'शेखर'
ग़ज़ल
सुनाते
हैं
- shaan manral
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डाली
है
ख़ुद
पे
ज़ुल्म
की
यूँँ
इक
मिसाल
और
उसके
बग़ैर
काट
दिया
एक
साल
और
Subhan Asad
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क्या
सितम
है
कि
अब
तिरी
सूरत
ग़ौर
करने
पे
याद
आती
है
Jaun Elia
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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ख़ून
से
सींची
है
मैं
ने
जो
ज़मीं
मर
मर
के
वो
ज़मीं
एक
सितम-गर
ने
कहा
उस
की
है
Javed Akhtar
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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क्या
सितम
करते
हैं
मिट्टी
के
खिलौने
वाले
राम
को
रक्खे
हुए
बैठे
हैं
रावण
के
क़रीब
Asghar Mehdi Hosh
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क्या
सितम
है,
लोग
मेरे
दुख
में
भी
बस
फाइलातुन
वाइलातुन
देखते
है
Saad Ahmad
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सुख़न
का
जोश
कम
होता
नहीं
है
वगरना
क्या
सितम
होता
नहीं
है
भले
तुम
काट
दो
बाज़ू
हमारे
क़लम
का
सर
क़लम
होता
नहीं
है
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Baghi Vikas
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इक
तो
ये
नूर
उस
पे
मेरी
शर्म
भी
अलग
तू
सामने
रहा
तो
निगह
उठ
न
पाएगी
shaan manral
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दर्द
से
दामन
छुड़ाना
आ
गया
या'नी
फिर
से
मुस्कुराना
आ
गया
आप
हासिल
हैं
जिसे
ऐ
दिल-नशीं
हाथ
में
उस
के
ख़ज़ाना
आ
गया
आप
के
तेवर
बदल
ही
जाएँगे
चंद
पैसे
जो
कमाना
आ
गया
आप
तो
मासूम
लगते
हैं
बहुत
कैसे
फिर
दिल
ये
दुखाना
आ
गया
देखिए
मेरा
सफ़र
तो
ख़त्म
है
अब
फ़क़त
मेरा
ठिकाना
आ
गया
बाप
के
आराम
के
दिन
आ
गए
बेटे
को
आख़िर
कमाना
आ
गया
आपका
आँचल
मिला
है
धूप
में
आज
सर
पे
शामियाना
आ
गया
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shaan manral
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काटते
पेड़
भला
कैसे
हम
घोंसला
तोड़
न
पाए
हम
तो
shaan manral
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तुम
को
भी
मेरा
रोग
न
लग
जाए
चारा-गर
तो
मुझ
को
मेरे
हाल
पे
ही
छोड़
दीजिए
shaan manral
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जी
चाहता
है
एक
यही
काम
करने
को
मैं
अपने
दिल
का
हाल
ग़ज़ल
में
समेट
लूँ
वैसे
तुम्हारे
बारे
में
क्या
सोचता
हूँ
मैं
कह
दो
तो
वो
ख़याल
ग़ज़ल
में
समेट
लूँ
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shaan manral
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