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Asad Khan
titliyon men qayaam tha meraa
titliyon men qayaam tha meraa | तितलियों में क़याम था मेरा
- Asad Khan
तितलियों
में
क़याम
था
मेरा
कितना
ऊँचा
मक़ाम
था
मेरा
दाल
रोटी
निकाल
लेता
था
शा'इरी
करना
काम
था
मेरा
- Asad Khan
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उसको
राँझा
मत
कहो,
जो
ना
हुआ
फ़क़ीर
जो
ना
जोगन
हो
सकी,
सो
काहे
की
हीर!
Harman Dinesh
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लो
चाँद
हो
गया
नमू
माह-ए-ख़राम
का
ऐ
मोमिनों
लिबास-ए-सियाह
ज़ेब-ए-तन
करो
फ़र्श-ए-अज़ा
बिछा
के
अज़ाख़ाने
में
शजर
अब
सुब्ह-ओ-शाम
ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन
करो
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Shajar Abbas
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तुझे
न
आएँगी
मुफ़्लिस
की
मुश्किलात
समझ
मैं
छोटे
लोगों
के
घर
का
बड़ा
हूॅं
बात
समझ
Umair Najmi
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ये
तेरे
ख़त
ये
तेरी
ख़ुशबू
ये
तेरे
ख़्वाब-ओ-ख़याल
मता-ए-जाँ
हैं
तेरे
कौल
और
क़सम
की
तरह
गुज़िश्ता
साल
मैंने
इन्हें
गिनकर
रक्खा
था
किसी
ग़रीब
की
जोड़ी
हुई
रक़म
की
तरह
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Jaun Elia
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जन्मदिन
पर
भी
मुझे
वो
याद
अब
करता
नहीं
इस
ज़माने
में
कोई
इतना
भी
मुफ़्लिस
होगा
क्या
Harsh saxena
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पहली
ग़लती
पर
मत
छोड़ो
मुझको
तुम
पहली
रोटी
गोल
नहीं
बनती
जानाँ
Tanoj Dadhich
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खड़ा
हूँ
आज
भी
रोटी
के
चार
हर्फ़
लिए
सवाल
ये
है
किताबों
ने
क्या
दिया
मुझ
को
Nazeer Baaqri
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मुफ़लिसी
थी
और
हम
थे
घर
के
इकलौते
चराग़
वरना
ऐसी
रौशनी
करते
कि
दुनिया
देखती
Kashif Sayyed
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धूप
पड़े
उस
पर
तो
तुम
बादल
बन
जाना
अब
वो
मिलने
आए
तो
उसको
घर
ठहराना।
तुमको
दूर
से
देखते
देखते
गुज़र
रही
है
मर
जाना
पर
किसी
गरीब
के
काम
न
आना।
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Tehzeeb Hafi
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इसी
लिए
तो
है
ज़िंदाँ
को
जुस्तुजू
मेरी
कि
मुफ़लिसी
को
सिखाई
है
सर-कशी
मैं
ने
Ali Sardar Jafri
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दिल
का
दरिया
दिखाई
दे
रहा
हूॅं
ख़ुद
में
बहता
दिखाई
दे
रहा
हूॅं
अपनी
आँखों
को
बंद
कर
के
बता
अब
मैं
कैसा
दिखाई
दे
रहा
हूॅं
थोड़ा
सा
रह
गया
हूॅं
और
सबको
यूँँॅं
ही
पूरा
दिखाई
दे
रहा
हूॅं
इक
ग़ज़ल
आधी
रह
गई
है
मेरी
सो
मैं
आधा
दिखाई
दे
रहा
हूॅं
मैं
किसी
बस्ती
में
से
काटा
गया
एक
रक़्बा
दिखाई
दे
रहा
हूॅं
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Asad Khan
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ये
तेरे
ख़्वाब
से
जुड़ी
हुई
है
नींद
जो
आँख
में
भरी
हुई
है
मेरे
तो
सारे
ज़ख़्म
ताज़ा
हैं
आपकी
चोट
ही
सड़ी
हुई
है
ऐसा
क्या
काम
है
तुझे
ऐ
दोस्त
जाने
की
जल्दी
क्यूँ
लगी
हुई
है
आज
भी
इंतिज़ार
में
तेरे
इक
घड़ी
मेज़
पर
पड़ी
हुई
है
चंद
नोटों
के
नीचे
बटवे
में
उसकी
तस्वीर
भी
रखी
हुई
है
दिल
को
पत्थर
बना
के
रक्खा
है
ज़िंदगी
ठाठ
पे
अड़ी
हुई
है
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Asad Khan
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इस
जवानी
का
फ़साना
भूल
जाऊॅं
ज़ख़्मी
हूॅं
तो
दिल
लगाना
भूल
जाऊॅं
यानी
तुझको
याद
करना
बंद
कर
दूॅं
यानी
मेरी
जाँ
मैं
खाना
भूल
जाऊॅं
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Asad Khan
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हमारे
अपनों
को
जाता
भी
देखा
फिर
उनका
बाद
में
रस्ता
भी
देखा
जिसे
सोने
से
पहले
देखा
मैंने
उसी
को
ख़्वाब
में
मरता
भी
देखा
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Asad Khan
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कि
शहज़ादा
किसी
के
साथ
शहज़ादी
किसी
के
साथ
नहीं
चाहा
था
फिर
भी
हो
गई
शादी
किसी
के
साथ
Asad Khan
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