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Shajar Abbas
teraa jis din se intikhaab hua
teraa jis din se intikhaab hua | तेरा जिस दिन से इंतिख़ाब हुआ
- Shajar Abbas
तेरा
जिस
दिन
से
इंतिख़ाब
हुआ
यार
उस
दिन
से
मैं
ख़राब
हुआ
छोड़कर
तुम
चले
गए
कूचा
चूर
हम
सेाए
मेरा
ख़्वाब
हुआ
देख
के
तुझको
सब
हैं
हैरत
में
खार
के
दरमियाँ
गुलाब
हुआ
और
उभरी
है
शख़्सियत
मेरी
जब
से
मैं
साहिब-ए-किताब
हुआ
सर
को
ख़म
कर
लिया
नदामत
से
हश्र
में
जब
मेरा
हिसाब
हुआ
खो
दी
बीनाई
तुझको
रोते
हुए
मुझ
पे
नाज़िल
नया
अज़ाब
हुआ
क़ैस
से
हो
गई
जुदा
लैला
इश्क़
का
इख़्तिताम-ए-बाब
हुआ
वक़्त
रहते
जो
हो
गया
बेदार
बस
वही
शख़्स
कामयाब
हुआ
हो
गया
जब
ग़ुरूब
सूरज
तो
फिर
नमू
मेरा
माहताब
हुआ
तिश्ना-लब
एड़ियाँ
रगड़ते
रहे
कब
मुयस्सर
किसी
को
आब
हुआ
जुज़
ये
निकला
शजर
मोहब्बत
का
अश्क़
बारी
मेरा
निसाब
हुआ
- Shajar Abbas
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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अँधेरे
को
समझना
है
अँधेरों
की
परेशानी
कोई
सूरज
अँधेरों
की
परेशानी
न
समझेगा
Saarthi Baidyanath
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सूरज
से
जंग
जीतने
निकले
थे
बेवक़ूफ़
सारे
सिपाही
मोम
के
थे
घुल
के
आ
गए
Rahat Indori
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अगर
साए
से
जल
जाने
का
इतना
ख़ौफ़
था
तो
फिर
सहर
होते
ही
सूरज
की
निगहबानी
में
आ
जाते
Azm Shakri
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तेरे
होते
हुए
महफ़िल
में
जलाते
हैं
चराग़
लोग
क्या
सादा
हैं
सूरज
को
दिखाते
हैं
चराग़
Ahmad Faraz
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उरूज
पर
है
अज़ीज़ो
फ़साद
का
सूरज
जभी
तो
सूखती
जाती
हैं
प्यार
की
झीलें
Nami Nadri
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पुराने
साल
की
ठिठुरी
हुई
परछाइयाँ
सिमटीं
नए
दिन
का
नया
सूरज
उफ़ुक़
पर
उठता
आता
है
Ali Sardar Jafri
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दिन
ढल
गया
और
रात
गुज़रने
की
आस
में
सूरज
नदी
में
डूब
गया,
हम
गिलास
में
Rahat Indori
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मैं
अपनी
दुनिया
का
ऐसा
सूरज
हूँ
जिस
सूरज
का
गहना
मुश्किल
होता
है
Aalok Shrivastav
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देखकर
हाल-ए-परेशाँ
मेरा
लोगों
ने
कहा
हज़रत-ए-क़ैस
के
कुनबे
के
बशर
लगते
हो
Shajar Abbas
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इक
वक़्त
में
मेरी
जान
मुझे
ये
दोनों
इबादत
करने
दो
तुम
नाम
ज़बाँ
से
लेने
दो
चेहरे
की
ज़ियारत
करने
दो
Shajar Abbas
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हुस्न
बोला
जान
की
गर
ख़ैरियत
दरकार
है
हज़रत-ए-दिल
ख़ैमा-गाह-ए-इश्क़
में
शामिल
न
हो
Shajar Abbas
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चाय
का
रंग
तेरे
जैसा
था
तू
बहुत
याद
आई
महफ़िल
में
Shajar Abbas
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फूल
ने
देखिए
गुलशन
में
सलीक़े
से
शजर
पत्तियों
पे
भी
मेरा
नाम
सजा
रक्खा
है
Shajar Abbas
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