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Sandeep kushwaha
yaad ka kya hai vo kab aur kidhar aa jaa.e
yaad ka kya hai vo kab aur kidhar aa jaa.e | याद का क्या है वो कब और किधर आ जाए
- Sandeep kushwaha
याद
का
क्या
है
वो
कब
और
किधर
आ
जाए
अब
तो
मुमकिन
ही
नहीं
उनकी
ख़बर
आ
जाए
इत्तिफ़ाक़न
ही
जो
खोलूँ
कभी
खिड़की
अपनी
इत्तिफ़ाक़न
ही
मेरा
यार
नज़र
आ
जाए
- Sandeep kushwaha
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आए
थे
हँसते
खेलते
मय-ख़ाने
में
'फ़िराक़'
जब
पी
चुके
शराब
तो
संजीदा
हो
गए
Firaq Gorakhpuri
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इसी
ख़्वाब
में
ज़ाया'
किया
'ईद
को
हर
दम
कभी
बोले
वो
सीने
से
लगकर
मुबारक
हो
Harsh saxena
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फिजूलखर्ची
नहीं
करेंगे
हमारे
चंद
अच्छे
दोस्तों
ने
ये
वा'दा
ख़ुद
से
किया
हुआ
है
कि
शक्ल
अल्लाह
ने
अच्छी
दी
है
सो
बातें
अच्छी
नहीं
करेंगे
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Rehman Faris
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हर
गीत
में
हर
बार
गाऊँगा
तुझे
अपनी
ग़ज़ल
में
गुनगुनाऊँगा
तुझे
तू
ईद
है
और
तू
ही
दीवाली
मेरी
मैं
हर
बरस
यूँँही
मनाऊँगा
तुझे
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Krishnakant Kabk
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रहने
को
सदा
दहर
में
आता
नहीं
कोई
तुम
जैसे
गए
ऐसे
भी
जाता
नहीं
कोई
Kaifi Azmi
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अगर
मैं
कथा
का
क़लमकार
होता
यक़ीनन
ही
वो
तो
मिरा
यार
होता
लगाती
नहीं
हर
दफ़ा
वो
बहाने
लगा
लेती
सीने
से
गर
प्यार
होता
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Vijay Potter Singhadiya
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सितारे
और
क़िस्मत
देख
कर
घर
से
निकलते
हैं
जो
बुज़दिल
हैं
मुहूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
हमें
लेकिन
सफ़र
की
मुश्किलों
से
डर
नहीं
लगता
कि
हम
बच्चों
की
सूरत
देखकर
घर
से
निकलते
हैं
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Abrar Kashif
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इश्क़
हुआ
है
क्या
तुझ
को
भी
तेरा
जो
होगा
सो
होगा
shaan manral
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प्यास
जहाँ
की
एक
बयाबाँ
तेरी
सख़ावत
शबनम
है
पी
के
उठा
जो
बज़्म
से
तेरी
और
भी
तिश्ना-काम
उठा
Ali Sardar Jafri
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दूर
तक
छाए
थे
बादल
और
कहीं
साया
न
था
इस
तरह
बरसात
का
मौसम
कभी
आया
न
था
Qateel Shifai
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हमको
जिसकी
तलाश
थी
अब
तक
कोई
उसको
तलाश
बैठा
है
Sandeep kushwaha
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एक
ही
बात
का
हमें
डर
है
साँप
के
भेस
में
वो
अजगर
है
जाने
कब
अक्ल
आएगी
उसको
आदमी
है
प
यार
कमतर
है
इश्क़
में
तुमको
डूबना
होगा
इश्क़
दरिया
नहीं
समुंदर
है
चीज़
वो
ही
पसंद
आएगी
अपनी
औकात
से
जो
बाहर
है
तूने
चाहा,
वो
मिल
गया
तुझको
यार
कितना
हसीं
मुक़द्दर
है
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Sandeep kushwaha
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जन
सेवा
के
मार्ग
हज़ारों
हैं
लेकिन
नेता
जी
को
मोक्ष
मिलेगा
संसद
में
Sandeep kushwaha
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अपनी
नाकामी
से
भी
ख़ुश
होता
हूँ
नाकामी
के
क़िस्से
अच्छे
होते
हैं
Sandeep kushwaha
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इतनी
भी
तेज़
आपकी
आँखें
नहीं
हैं
,आप
जो
देख
पा
रहें
हैं
हक़ीक़त
नहीं
है
ये
दर
पे
जो
आ
गया
हूँ
तो
ख़िदमत
का
ढोंग
भी
रस्मन
निभा
रहे
हो
तो
ख़िदमत
नहीं
है
ये
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Sandeep kushwaha
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