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Sandeep kushwaha
vo ek vaqt tha unko gumaan tha ham par
vo ek vaqt tha unko gumaan tha ham par | वो एक वक़्त था उनको गुमान था हम पर
- Sandeep kushwaha
वो
एक
वक़्त
था
उनको
गुमान
था
हम
पर
ये
एक
वक़्त
है
हम
सेे
नज़र
नहीं
मिलती
- Sandeep kushwaha
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भीगी
पलकें
देख
कर
तू
क्यूँँ
रुका
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
तो
मेरी
आँख
में
कुछ
आ
गया
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आकर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
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Zubair Ali Tabish
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वफ़ा
नज़र
नहीं
आती
कहीं
ज़माने
में
वफ़ा
का
ज़िक्र
किताबों
में
देख
लेते
हैं
Hafeez Banarasi
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नज़र
में
रखना
कहीं
कोई
ग़म
शनास
गाहक
मुझे
सुख़न
बेचना
है
ख़र्चा
निकालना
है
Umair Najmi
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कभी
पहले
नहीं
था
जिस
क़दर
मजबूर
हूँ
मैं
आज
नज़र
आऊँ
न
ख़ुद
क्या
तुम
सेे
इतना
दूर
हूँ
मैं
आज
तुम्हारे
ज़ख़्म
को
ख़ाली
नहीं
जाने
दिया
मैंने
तुम्हारी
याद
में
ही
चीख़
के
मशहूर
हूँ
मैं
आज
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SHIV SAFAR
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मुझे
भी
बख़्श
दे
लहजे
की
ख़ुशबयानी
सब
तेरे
असर
में
हैं
अल्फ़ाज़
सब,
म'आनी
सब
मेरे
बदन
को
खिलाती
है
फूल
की
मानिंद
कि
उस
निगाह
में
है
धूप,
छाँव,
पानी
सब
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Subhan Asad
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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फिर
किसी
के
सामने
चश्म-ए-तमन्ना
झुक
गई
शौक़
की
शोख़ी
में
रंग-ए-एहतराम
आ
ही
गया
Asrar Ul Haq Majaz
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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तिरे
जमाल
की
तस्वीर
खींच
दूँ
लेकिन
ज़बाँ
में
आँख
नहीं
आँख
में
ज़बान
नहीं
Jigar Moradabadi
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आँख
भर
आई
किसी
से
जो
मुलाक़ात
हुई
ख़ुश्क
मौसम
था
मगर
टूट
के
बरसात
हुई
Manzar Bhopali
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शांत
दरिया
के
पास
बैठा
है
यानी
लड़का
उदास
बैठा
है
होश
दुनिया
को
बाँटता
था
जो
आज
ख़ुद
बद-हवा
से
बैठा
है
वो
जो
दिखता
नहीं
हमें
लेकिन
वो
कहीं
आस-पास
बैठा
है
तृप्त
दिखने
का
ढोंग
मत
करिए
दिल
अगर
ले
के
प्यास
बैठा
है
वो
मेरा
भी
तो
ख़ास
होता
था
जो
तेरा
बन
के
ख़ास
बैठा
है
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Sandeep kushwaha
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अपनी
नाकामी
से
भी
ख़ुश
होता
हूँ
नाकामी
के
क़िस्से
अच्छे
होते
हैं
Sandeep kushwaha
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ये
तेरा
रंग
नया
है
तू
सँभलियो
प्यारे
रंग
उतरे
तो
ये
दीवार
बुरी
लगती
है
Sandeep kushwaha
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अब
क्यूँँ
मेरे
ज़ख़्म
भला
नासूर
हुए
?
मैं
तो
सबकी
ख़ातिर
मरहम
होता
हूँ
Sandeep kushwaha
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क़िस्से
सुना
रहा
हूँ
मैं
तुमको
शबाब
के
दिल
हो
गया
था
जब
क़रीं
इक
माहताब
के
वो
जो
शरीफ़
है
तो
है
दुनिया
के
सामने
अरमाँ
मचल
रहें
हैं
मगर
उस
गुलाब
के
ख़ुशबू
गुलों
की
और
कहीं
हो
रहीं
फ़ना
हक़दार
चूमता
रहा
पन्ने
किताब
के
कितनी
मशक़्क़तें
हैं
सितारों
से
पूछिए
रौशन
जो
हो
रहे
हैं
बिना
आफ़ताब
के
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Sandeep kushwaha
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