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Sandeep Thakur
dil ke darwaaze bhed kar dekho
dil ke darwaaze bhed kar dekho | दिल के दरवाजे भेड़ कर देखो
- Sandeep Thakur
दिल
के
दरवाजे
भेड़
कर
देखो
जख़्म
सारे
उधेड़
कर
देखो
बंद
कमरे
में
आईने
से
कभी
तुम
मेरा
जिक्र
छेड़
कर
देखो
- Sandeep Thakur
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हम
मिल
के
आ
गए
मगर
अच्छा
नहीं
लगा
फिर
यूँँ
हुआ
असर
कि
घर
अच्छा
नहीं
लगा
इक
बार
दिल
में
तुझ
सेे
जुदाई
का
डर
बना
फिर
दूसरा
कोई
भी
डर
अच्छा
नहीं
लगा
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Shriyansh Qaabiz
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शाम-ए-फ़िराक़
अब
न
पूछ
आई
और
आ
के
टल
गई
दिल
था
कि
फिर
बहल
गया
जाँ
थी
कि
फिर
सँभल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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दिल
हारने
के
बाद
ही
आता
है
ये
सुख़न
अब
तक
किसी
ने
कोख
से
शायर
नहीं
जना
Anas Khan
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तो
क्या
ये
हो
नहीं
सकता
कि
तुझ
से
दूर
हो
जाऊँँ
मैं
तुझ
को
भूलने
के
वासते
मजबूर
हो
जाऊँ
सुना
है
टूटने
पर
दिल
सभी
कुछ
कर
गुजरते
हैं
मुझे
भी
तोड़
दो
इतना
कि
मैं
मशहूर
हो
जाऊँ
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SHIV SAFAR
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दिल
को
तेरी
चाहत
पे
भरोसा
भी
बहुत
है
और
तुझ
से
बिछड़
जाने
का
डर
भी
नहीं
जाता
Ahmad Faraz
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तुम्हें
इक
मश्वरा
दूँ
सादगी
से
कह
दो
दिल
की
बात
बहुत
तैयारियाँ
करने
में
गाड़ी
छूट
जाती
है
Zubair Ali Tabish
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न
तेरे
आने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
न
दिल
लगाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
क़सम
ख़ुदा
की
बताता
हूँ
राज़
ये
तुमको
नहारी
खाने
से
मेरा
शबाब
लौटा
है
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Paplu Lucknawi
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हम
लबों
से
कह
न
पाए
उन
से
हाल-ए-दिल
कभी
और
वो
समझे
नहीं
ये
ख़ामुशी
क्या
चीज़
है
Nida Fazli
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हमने
जिस
मासूम
परी
को
अपने
दिल
की
जाँ
बोला
था
उसने
हमको
धोखा
देकर
और
किसी
को
हाँ
बोला
था
सारे
वादे
भूल
गई
तुम
कोई
बात
नहीं
जानेमन
लेकिन
ये
कैसे
भूली
तुम
मेरी
माँ
को
माँ
बोला
था
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Tanoj Dadhich
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उम्र
गुज़री
दवाएँ
करते
'मीर'
दर्द-ए-दिल
का
हुआ
न
चारा
हनूज़
Meer Taqi Meer
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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दरिया
की
लहरें
खुल
के
आज
गले
लगती
पुल
के
सूरज
भी
बन
सकते
हैं
सारे
जुगनू
मिल-जुल
के
शाम
उतर
आई
आख़िर
आज
बग़ावत
पे
खुल
के
बारिश
में
दरिया
के
संग
मिट्टी
बहती
है
घुल
के
गुजरे
पतझड़
के
साए
पहने
कोट
नए
गुल
के
तन-मन
भीग
गया
बरसीं
आँख
घटा
सब
मिल-जुल
के
प्यार
बिका
बाज़ारों
में
सोने-चांदी
में
तुल
के
चाँद
नदी
से
टकरा
कर
घिसता
जाए
घुल-घुल
के
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Sandeep Thakur
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आज
पलटे
जो
ख़्बाब
के
पन्ने
मैंने
दिल
की
किताब
के
पन्ने
वक़्त
ने
देख
मोड़
रक्खे
हैं
तेरे
हुस्नो
शबाब
के
पन्ने
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Sandeep Thakur
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लिख
के
उंगली
से
धूल
पे
कोई
ख़ुद
हँसा
अपनी
भूल
पे
कोई
याद
करके
किसी
के
चेहरे
को
रख
गया
होंठ
फूल
पे
कोई
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Sandeep Thakur
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बेवजह
मुझ
सेे
फिर
ख़फ़ा
क्यूँ
है
ये
कहानी
ही
हर
दफ़ा
क्यूँ
है
कुछ
भी
मजबूरी
तो
नहीं
दिखती
मैं
क्या
जानूं
वो
बे-वफ़ा
क्यूँ
है
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Sandeep Thakur
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