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Sandeep Thakur
dariyaa ki lahren khul ke
dariyaa ki lahren khul ke | दरिया की लहरें खुल के
- Sandeep Thakur
दरिया
की
लहरें
खुल
के
आज
गले
लगती
पुल
के
सूरज
भी
बन
सकते
हैं
सारे
जुगनू
मिल-जुल
के
शाम
उतर
आई
आख़िर
आज
बग़ावत
पे
खुल
के
बारिश
में
दरिया
के
संग
मिट्टी
बहती
है
घुल
के
गुजरे
पतझड़
के
साए
पहने
कोट
नए
गुल
के
तन-मन
भीग
गया
बरसीं
आँख
घटा
सब
मिल-जुल
के
प्यार
बिका
बाज़ारों
में
सोने-चांदी
में
तुल
के
चाँद
नदी
से
टकरा
कर
घिसता
जाए
घुल-घुल
के
- Sandeep Thakur
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जब
सर-ए-शाम
पजीराई-ए-फ़न
होती
है
शाहज़ादी
को
कनीज़ों
से
जलन
होती
है
ले
तो
आया
हूँ
तुझे
घेर
के
अपनी
जानिब
आगे
इंसान
की
अपनी
भी
लगन
होती
है
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Azhar Faragh
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ख़ुश
रहते
हैं
हँस
सकते
हैं
भोले
भाले
होते
हैं
वो
जो
शे'र
नहीं
कहते
हैं
क़िस्मत
वाले
होते
हैं
पीना
अच्छी
बात
नहीं
है
आते
हैं
समझाने
दोस्त
और
ढलते
ही
शाम
उन्हें
फिर
हमीं
सँभाले
होते
हैं
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Vineet Aashna
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हम
भी
गाँव
में
शाम
को
बैठा
करते
थे
हमको
भी
हालात
ने
बाहर
भेजा
है
Zahid Bashir
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अजब
अंदाज़
के
शाम-ओ-सहर
हैं
कोई
तस्वीर
हो
जैसे
अधूरी
Asad Bhopali
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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शाम
भी
थी
धुआँ
धुआँ
हुस्न
भी
था
उदास
उदास
दिल
को
कई
कहानियाँ
याद
सी
आ
के
रह
गईं
Firaq Gorakhpuri
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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आख़िरी
बार
मैं
कब
उस
से
मिला
याद
नहीं
बस
यही
याद
है
इक
शाम
बहुत
भारी
थी
Hammad Niyazi
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सुब्ह-ए-मग़रूर
को
वो
शाम
भी
कर
देता
है
शोहरतें
छीन
के
गुमनाम
भी
कर
देता
है
वक़्त
से
आँख
मिलाने
की
हिमाकत
न
करो
वक़्त
इंसान
को
नीलाम
भी
कर
देता
है
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Nadeem Farrukh
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लिख
के
उंगली
से
धूल
पे
कोई
ख़ुद
हँसा
अपनी
भूल
पे
कोई
याद
करके
किसी
के
चेहरे
को
रख
गया
होंठ
फूल
पे
कोई
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Sandeep Thakur
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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गुल
सा
तू
तेरा
साथ
ख़ुशबू
सा
हाथ
में
तेरा
हाथ
ख़ुशबू
सा
हो
के
तुझ
से
जुदा
भटकता
हूँ
गुल
से
बिछड़ी
अनाथ
ख़ुशबू
सा
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Sandeep Thakur
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जब
मुंडेरों
से
धूप
ढलती
है
तो
कमी
उसकी
मुझको
खलती
है
जो
हथेली
पे
अपनी
लिखती
थी
दोस्ती
प्यार
में
बदलती
है
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Sandeep Thakur
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इश्क़
से
अपने
कुछ
चुने
लम्हें
अनकहे
और
अनसुने
लम्हें
आओ
मिलकर
जियें
दुबारा
से
सर्द
रातों
के
गुनगुने
लम्हें
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Sandeep Thakur
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