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Saahir
hont ka zaika bhi gaya aankh ki maykashi bhi gaii
hont ka zaika bhi gaya aankh ki maykashi bhi gaii | होंठ का ज़ाइका भी गया आँख की मयकशी भी गई
- Saahir
होंठ
का
ज़ाइका
भी
गया
आँख
की
मयकशी
भी
गई
इक
तेरे
जाने
के
बाद
इस
रूह
की
सादगी
भी
गई
- Saahir
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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लग
गई
मुझको
नज़र
बेशक़
तुम्हारी
आईनों
मैं
बहुत
ख़ुश
था
किसी
इक
सिलसिले
से
उन
दिनों
Aarush Sarkaar
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फिर
किसी
के
सामने
चश्म-ए-तमन्ना
झुक
गई
शौक़
की
शोख़ी
में
रंग-ए-एहतराम
आ
ही
गया
Asrar Ul Haq Majaz
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लाई
न
ऐसों-वैसों
को
ख़ातिर
में
आज
तक
ऊँची
है
किस
क़दर
तिरी
नीची
निगाह
भी
Firaq Gorakhpuri
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आँख
की
बेबसी
दिल
का
डर
देखना
तुम
किसी
दिन
ग़रीबों
का
घर
देखना
Alankrat Srivastava
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तुम्हें
ज़रूर
कोई
चाहतों
से
देखेगा
मगर
वो
आँखें
हमारी
कहाँ
से
लाएगा
तुम्हारे
साथ
ये
मौसम
फ़रिश्तों
जैसा
है
तुम्हारे
बा'द
ये
मौसम
बहुत
सताएगा
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Bashir Badr
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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मुझे
तो
उसका
भीतरी
ग़ुबार
है
निकालना
सो
आँख
चूमता
हूँ
उसके
होंठ
चूमता
नहीं
Siddharth Saaz
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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पहले
ही
इश्क़
ने
ये
बताया
मुझे
छोड़
कर
जाएगी
आशिक़ी
दर्द
में
मौत
को
कहते
हैं
सब
बुरा
दर्द
क्यूँ
कितना
आराम
है
आख़िरी
दर्द
में
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Saahir
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सोचता
हूँ
कि
क्या
चीज़
ये
ज़िंदगी
है
बढ़
रही
है
या
फिर
उम्र
कम
हो
रही
है
जज़्ब,
बहरें,
म'आनी,
अदब,
तज़रबे
आदि
इन
सभी
को
मिला
जो
बने,
शा'इरी
है
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Saahir
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तेज़
गिरती
धूप
देखी
तब
खुला
मुझपे
सिर्फ़
बारिश
ही
नहीं
हैं
आसमाँ
का
दुख
Saahir
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कौन
सा
दर्जा
मिलेगा
दोस्त
मुझको
तुम
बताओ
तो
मैं
न
तेरी
आख़िरी
थी
और
न
ही
पहली
मुहब्बत
हूँ
Saahir
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नाम
राधे-श्याम
लेती
क्यूँ
है
दुनिया
प्यार
झूठा
तो
नहीं
था
रुक्मणी
का
Saahir
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