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Pritam sihag
antar hai ye rishta rakhne aur nibhaane men
antar hai ye rishta rakhne aur nibhaane men | अंतर है ये रिश्ता रखने और निभाने में
- Pritam sihag
अंतर
है
ये
रिश्ता
रखने
और
निभाने
में
हर
कोई
नहीं
जल
सकता
दीप
जलाने
में
- Pritam sihag
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कौन
सी
दीवार
है
मौजूद
इस
रिश्ते
में
'साज़'
क्यूँँ
नहीं
रो
सकते
हम
अपने
पिता
के
सामने
Siddharth Saaz
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ज़िंदगी
तुझ
से
भी
क्या
ख़ूब
त'अल्लुक़
है
मिरा
जैसे
सूखे
हुए
पत्ते
से
हवा
का
रिश्ता
Khalish Akbarabadi
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तुम्हारा
तो
ख़ुदास
राबता
है
तो
देखो
ना,
हमारे
दुख
बता
कर
Siddharth Saaz
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उस
ख़ूब-रू
से
रब्त
ज़रा
कम
हुआ
मेरा
ये
देख
कर
उदासी
मेरे
संग
लग
गई
Siddharth Saaz
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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बाक़ी
नहीं
रहा
है
कोई
रब्त
शहरस
यानी
कि
ख़ुश
रहेंगे
यहाँ
ख़ुश
रहे
बग़ैर
pankaj pundir
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प्यार
का
रिश्ता
ऐसा
रिश्ता
शबनम
भी
चिंगारी
भी
यानी
उन
सेे
रोज़
ही
झगड़ा
और
उन्हीं
से
यारी
भी
Ateeq Allahabadi
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इतना
धीरे-धीरे
रिश्ता
ख़त्म
हुआ
बहुत
दिनों
तक
लगा
नहीं
हम
बिछड़े
हैं
Ajmal Siddiqui
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जिस
लब
के
ग़ैर
बोसे
लें
उस
लब
से
'शेफ़्ता'
कम्बख़्त
गालियाँ
भी
नहीं
मेरे
वास्ते
Mustafa Khan Shefta
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उसने
हँसते
हुए
तोड़ा
था
हमारा
रिश्ता
हम
सभी
को
ये
बताते
हुए
रो
देते
हैं
Zubair Alam
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एक
और
वा'दा
उसने
किया
मोहब्बत
का
पिछले
साल
भी
ऐसे
वादे
से
वो
मुकरी
थी
Pritam sihag
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तेरे
बग़ैर
मेरा
अफ़्साना
चाहता
हूँ
या'नी
कि
ज़िंदगी
में
वीराना
चाहता
हूँ
यूँँ
ही
नहीं
लगाया
सिगरेट
को
लबों
से
मैं
उसकी
सारी
यादें
सुलगाना
चाहता
हूँ
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Pritam sihag
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ये
सोचा
था
ग़रीबी
को
किताबों
से
मिटाऊँगा
न
था
मालूम
मैं
भूखा
किताबें
ही
खा
जाऊँगा
मिरे
कंधों
पे
घर
का
बोझ
आता
जा
रहा
है
अब
मैं
अब
ख़्वाबों
को
बाहर
का
ही
रास्ता
तो
दिखाऊंँगा
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Pritam sihag
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ये
कहानी
झूठी
है
,पर
सच्चा
मैं
किरदार
हूँ
यूँँ
ख़फ़ा
मत
हो
तू
,मैं
तेरे
बिना
बे-कार
हूँ
ए
मोहब्बत
के
समुंदर
मुझ
को
ले
डूबेगा
तू
कश्ती
भी
उसकी
हुई
,ऊपर
से
बे-पतवार
हूँ
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Pritam sihag
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जानते
हो
तुम
सच्चे
इश्क़
की
रवानी
क्या
मरने
भर
से
पूरी
हो
जाती
है
कहानी
क्या
मेरी
इन
सफलताओं
से
उदास
हैं
वो
सब
उनको
ये
नहीं
दिखती
काँटों
की
निशानी
क्या
क्यूँँ
उदास
रहते
हो
साफ़
साफ़
कह
दो
ये
अबकी
बार
भी
वो
बातें
नहीं
निभानी
क्या
अपने
प्यारे
से
क्यूँँ
तुम
सारे
दिन
झगड़ते
हो
आपको
ये
कश्ती
तट
पर
नहीं
लगानी
क्या
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Pritam sihag
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