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Prit
ye paagal log jinke rang men bhi dharm hota hai
ye paagal log jinke rang men bhi dharm hota hai | ये पागल लोग जिनके रंग में भी धर्म होता है
- Prit
ये
पागल
लोग
जिनके
रंग
में
भी
धर्म
होता
है
पढ़ें
गीता
तो
जाने
धर्म
मतलब
कर्म
होता
है
जिसे
सोहबत
मिले
कान्हा
की
मिथ्या
जाने
दुनिया
को
उसे
ख़तरा
नहीं
है
जिसको
शिव
का
मर्म
होता
है
- Prit
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तदबीर
के
दस्त-ए-रंगीं
से
तक़दीर
दरख़्शाँ
होती
है
क़ुदरत
भी
मदद
फ़रमाती
है
जब
कोशिश-ए-इंसाँ
होती
है
Hafeez Banarasi
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यार
तस्वीर
में
तन्हा
हूँ
मगर
लोग
मिले
कई
तस्वीर
से
पहले
कई
तस्वीर
के
बा'द
Umair Najmi
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अलमास
धरे
रह
जाते
हैं
बिकता
है
तो
पत्थर
बिकता
है
अजनास
नहीं
इस
दुनिया
में
इंसाँ
का
मुक़द्दर
बिकता
है
'खालिद
सज्जाद'
सुनार
हूँ
मैं
इस
ग़म
को
ख़ूब
समझता
हूँ
जब
बेटा
छुप
कर
रोता
है
तब
माँ
का
ज़ेवर
बिकता
है
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Khalid Sajjad
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बहुत
से
लोग
हैं
तस्वीर
में
अच्छे
बहुत
अच्छे
तेरे
चेहरे
पे
ही
मेरी
नज़र
हरदम
ठहरती
है
Umesh Maurya
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क़ब्रों
में
नहीं
हम
को
किताबों
में
उतारो
हम
लोग
मोहब्बत
की
कहानी
में
मरे
हैं
Ajaz tawakkal
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ठहाका
मार
कर
हथियार
हँसते
नहीं
जीतेंगे
अब
इंसान
हम
सेे
Umesh Maurya
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कुछ
लोग
ख़यालों
से
चले
जाएँ
तो
सोएँ
बीते
हुए
दिन
रात
न
याद
आएँ
तो
सोएँ
Habib Jalib
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लोग
टूट
जाते
हैं
एक
घर
बनाने
में
तुम
तरस
नहीं
खाते
बस्तियाँ
जलाने
में
Bashir Badr
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वो
लोग
हम
ही
थे
मुहब्बत
में
जो
फिर
आगे
हुए
वो
लोग
हम
ही
थे
मियाँ
जो
दूर
भागे
जिस्म
से
Kartik tripathi
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क्या
लोग
हैं
कि
दिल
की
गिरह
खोलते
नहीं
आँखों
से
देखते
हैं
मगर
बोलते
नहीं
Akhtar Hoshiyarpuri
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आज
करता
हूँ
बात
फूलों
की
बात
में
है
सिफ़ात
फूलों
की
उसके
चेहरे
पे
रंग
फूलों
का
उसके
होंठों
पे
बात
फूलों
की
पैरहन
उसका
साफ़
पानी
है
उसका
पर्दा
क़नात
फूलों
की
जब
कभी
उसका
ज़िक्र
हो
आया
छेड़
दी
हमने
बात
फूलों
की
मेरी
आँखों
में
ख़्वाब
फूलों
का
उसके
बिस्तर
पे
रात
फूलों
की
किसने
जाना
है
दर्द
फूलों
का
कौन
समझा
है
बात
फूलों
की
उन
पे
लिखनी
थी
इक
ग़ज़ल
हमको
हमने
लिख
दी
सिफ़ात
फूलों
की
कभी
ब्याही
थी
बेटियाँ
हमने
कभी
की
थी
ज़कात
फूलों
की
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Prit
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नौकरी
पा
के
लौटा
मैं
जब
घर
देखा
तो
उसकी
शादी
हो
चुकी
थी
Prit
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क़सम
खाने
से
कोई
मरता
होता
तो
क़सम
शिव
की
मैं
कब
का
मर
गया
होता
Prit
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घड़ी
भर
चैन
से
तो
बैठ,
क्यूँँ
हर
बार
रोता
है
कहा
तो
कहता
है
ये
इश्क़
है,
ऐसे
ही
होता
है
गुज़ार
आया
शब-ए-वस्ल-ए-मोहब्बत
बातों
बातों
में
सुब्ह
मालूम
जाना
इश्क़
मतलब
जिस्म
होता
है
वो
ज़िंदा
हो
तो
पागल,
मरने
पर
आसेब
बनता
है
भला
कब
तक
असीर
ए
इश्क़
गहरी
नींद
सोता
है
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Prit
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आज
कल
मुझ
सेे
तुम
रूठती
भी
नहीं
बात
क्या
है
जाँ,
किस
बात
पे
रूठी
हो
Prit
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