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Prit
aaj karta hooñ baat phoolon kii
aaj karta hooñ baat phoolon kii | आज करता हूँ बात फूलों की
- Prit
आज
करता
हूँ
बात
फूलों
की
बात
में
है
सिफ़ात
फूलों
की
उसके
चेहरे
पे
रंग
फूलों
का
उसके
होंठों
पे
बात
फूलों
की
पैरहन
उसका
साफ़
पानी
है
उसका
पर्दा
क़नात
फूलों
की
जब
कभी
उसका
ज़िक्र
हो
आया
छेड़
दी
हमने
बात
फूलों
की
मेरी
आँखों
में
ख़्वाब
फूलों
का
उसके
बिस्तर
पे
रात
फूलों
की
किसने
जाना
है
दर्द
फूलों
का
कौन
समझा
है
बात
फूलों
की
उन
पे
लिखनी
थी
इक
ग़ज़ल
हमको
हमने
लिख
दी
सिफ़ात
फूलों
की
कभी
ब्याही
थी
बेटियाँ
हमने
कभी
की
थी
ज़कात
फूलों
की
- Prit
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तूने
मुझपे
बहुत
सितम
ढाए
सो
मेरी
उम्र
तुझको
लग
जाए
दिल
की
हालत
बिगाड़
दी
मैंने
कौन
कम-ज़र्फ़
पर
तरस
खाए
गुज़रे
दिन
जो
गुज़र
गया
सदा
को
कहो
उस
सेे
कि
घर
को
लौट
आए
कौन
शायर
से
इश्क़
कर
बैठा
किसने
सहरा
में
अब्र
बरसाए
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Prit
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सीधी
सादी
सी
कोई
टेढ़ी
चीज़
अब
नहीं
मिलती
मेरे
जैसी
चीज़
पहला
ख़त
पहला
प्यार
पहला
ग़म
ज़हर-ओ-फंदा
सब
एक
जैसी
चीज़
गुड़
जलेबी
मिठाई
हलवा
चाय
उसके
होंठों
के
आगे
फीकी
चीज़
आज
मैं
उसके
होंठ
चूम
आया
चख
ली
दुनिया
की
सब
सेे
मीठी
चीज़
तेरे
'आशिक़
हज़ार
हैं
अच्छा
बड़ी
सस्ती
है
तुझ
सी
महँगी
चीज़
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Prit
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उसके
बिन
तेरा
दिल
नहीं
लगता?
चल
तो
फिर
एक
काम
कर,
मर
जा
Prit
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जिसको
ख़ुद
की
ख़बर
नहीं
रहती
वो
तेरी
फ़िक्र
करता
रहता
है
Prit
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वो
कभी
मेरे
गले
आ
मिलता
सहरा
में
प्यासे
को
दरिया
मिलता
वो
मेरा
हाथ
पकड़
के
चलता
भटके
नाविक
को
किनारा
मिलता
इश्क़
में
दर्द
मिले
सिर्फ़
और
सिर्फ़
और
कुछ
मिलता
भी
तो
क्या
मिलता
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Prit
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