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Prit
naukri pa ke lautaa main jab ghar
naukri pa ke lautaa main jab ghar | नौकरी पा के लौटा मैं जब घर
- Prit
नौकरी
पा
के
लौटा
मैं
जब
घर
देखा
तो
उसकी
शादी
हो
चुकी
थी
- Prit
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शायद
उसने
कभी
वफ़ा
की
ही
नइँ
जो
ये
कहता
है
आँखें
बोलती
नइँ
किसी
पे
इक
दफ़ा
दिल
आ
जाए
बंदा
क्या
फिर
तो
रब
की
चलती
नइँ
तेरी
ख़ामोशी
भी
सुनी
मैं
ने
तू
ने
आवाज़
भी
मेरी
सुनी
नइँ
घर
से
दफ़्तर
तलक
सफ़र
है
सिर्फ़
मौत
है
जानी
फिर
ये
ज़िंदगी
नइँ
उसको
कैसे
बुरी
लगी
मेरी
बात
बात
भी
वो
कभी
जो
मैं
ने
की
नइँ
उसे
बिन
देखें
देख
लेते
हैं
हम
वो
हमें
देखकर
भी
देखती
नइँ
आप
कुछ
ज़्यादा
अपने
आप
से
हैं
वरना
मुझ
में
तो
कोई
भी
कमी
नइँ
कभी
चुप
रह
के
कितना
कहती
है
कभी
वो
बोलकर
भी
बोलती
नइँ
'प्रीत'
आज़ादी
ऐसी
जैसे
हो
क़ैद
क़ैद
ऐसी
जहाँ
गिरफ़्तगी
नइँ
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Prit
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मेरे
नाम
से
उसने
नाम
उसका
कुछ
ऐसे
बदला
जैसे
भाड़ा
ज़्यादा
मिलने
पर
किराएदार
बदल
दिए
जाते
हों
Prit
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मेरी
क़िस्मत
के
क्या
कहने,
बदन
से
नाग
लिपटा
है
ये
काला
नाग
ज़हरीला
सा,
इसको
इश्क़
कहते
हैं
Prit
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वो
तन
अजमेर
की
चौखट,
वो
दिल
वाराणसी
का
दर
मेरा
माही
मेरा
मज़हब
है,
उसका
दिल
है
मेरा
घर
Prit
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मैंने
कांटो
से
उलझ
कर
जाना
फूलों
से
इश्क़
बड़ा
मुश्किल
है
Prit
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