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Prit
meri qismat ke kya kehne badan se naag lipta hai
meri qismat ke kya kehne badan se naag lipta hai | मेरी क़िस्मत के क्या कहने, बदन से नाग लिपटा है
- Prit
मेरी
क़िस्मत
के
क्या
कहने,
बदन
से
नाग
लिपटा
है
ये
काला
नाग
ज़हरीला
सा,
इसको
इश्क़
कहते
हैं
- Prit
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सख़्त
सर्दी
में
ठिठुरती
है
बहुत
रूह
मिरी
जिस्म-ए-यार
आ
कि
बेचारी
को
सहारा
मिल
जाए
Farhat Ehsaas
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इश्क़
को
पूछता
नहीं
कोई
हुस्न
का
एहतिराम
होता
है
Asrar Ul Haq Majaz
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जब
से
तूने
ये
बोला
था
"बदन
का
क्या
है
मिट्टी
है"
तब
से
तेरी
पीठ
पे
मुझको
हरसिंगार
उगाने
थे
Siddharth Saaz
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दिसंबर
की
सर्दी
है
उसके
ही
जैसी
ज़रा
सा
जो
छू
ले
बदन
काँपता
है
Amit Sharma Meet
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ख़ुद
हुस्न
से
न
पूछिए
ता'रीफ़
हुस्न
की
दीवाने
से
ये
पूछिए
दीवाना
क्यूँँ
हुआ
Ameer Imam
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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कहाँ
हम
ग़ज़ल
का
हुनर
जानते
हैं
मगर
इस
ज़बाँ
का
असर
जानते
हैं
ये
वो
हुस्न
जिसको
निखारा
गया
है
नया
कुछ
नहीं
हम
ख़बर
जानते
हैं
कि
है
जो
क़फ़स
में
वो
पंछी
रिहा
हो
परिंदें
ज़मीं
के
शजर
जानते
हैं
फ़क़त
रूह
के
नाम
है
इश्क़
लेकिन
बदन
के
हवाले
से
घर
जानते
हैं
फ़ुलाँ
है
फ़ुलाँ
का
यक़ीं
हैं
हमें
भी
सुनो
हम
उसे
सर-ब-सर
जानते
हैं
कि
अब
यूँँ
सिखाओ
न
रस्म-ए-सियासत
झुकाना
कहाँ
है
ये
सर
जानते
हैं
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Neeraj Neer
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है
उस
बदन
की
लत
मुझे
सो
दूसरा
बदन
अच्छा
तो
लग
रहा
है
मेरे
काम
का
नहीं
Vishnu virat
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बदन
का
सारा
लहू
खिंच
के
आ
गया
रुख़
पर
वो
एक
बोसा
हमें
दे
के
सुर्ख़-रू
है
बहुत
Zafar Iqbal
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आईने
आँख
में
चुभते
थे
बिस्तर
से
बदन
कतराता
था
एक
याद
बसर
करती
थी
मुझे
मैं
साँस
नहीं
ले
पाता
था
Tehzeeb Hafi
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कुछ
अलग
करने
की
कशिश
है,
सो
अपनी
हालत
तबाह
कर
रहे
हैं
Prit
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मेरे
अपने
हर
इक
पल
मेरा
दिल
नाशाद
करते
थे
मुझे
बर्बाद
कर
के
कहते
थे
आबाद
करते
थे
सो
मेरे
मसअलों
ने
ज़िंदगी
को
मौत
कर
डाला
जो
मुझको
जानते
थे
लाश
कह
कर
याद
करते
थे
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Prit
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अभी
तुमने
मुहब्बत
देखी
है,
नफ़रत
कहाँ
देखी
अभी
सिक्के
का
तुमने
सिर्फ़
इक
ही
पहलू
देखा
है
Prit
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आज
तो
ख़ुदा
को
भी
बेनक़ाब
करना
है
रे,
उसे
बुलाओ,
उसका
हिसाब
करना
है
आब-ए-चश्म
को
अपने
बहा
के
सागर
में
आज
तो
मुझे
सागर
को
शराब
करना
है
छीनकर
काँसा
उसको
अपना
ताज
देकर
के
उस
फ़कीर
को
भी
मैने
नवाब
करना
है
शा'इरी
बना
कर
सब
को
सुना
के
ऐसे
ही
"प्रीत"
हर
शख़्स
को
मैंने
गुलाब
करना
है
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Prit
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शायद
उसने
कभी
वफ़ा
की
ही
नइँ
जो
ये
कहता
है
आँखें
बोलती
नइँ
किसी
पे
इक
दफ़ा
दिल
आ
जाए
बंदा
क्या
फिर
तो
रब
की
चलती
नइँ
तेरी
ख़ामोशी
भी
सुनी
मैं
ने
तू
ने
आवाज़
भी
मेरी
सुनी
नइँ
घर
से
दफ़्तर
तलक
सफ़र
है
सिर्फ़
मौत
है
जानी
फिर
ये
ज़िंदगी
नइँ
उसको
कैसे
बुरी
लगी
मेरी
बात
बात
भी
वो
कभी
जो
मैं
ने
की
नइँ
उसे
बिन
देखें
देख
लेते
हैं
हम
वो
हमें
देखकर
भी
देखती
नइँ
आप
कुछ
ज़्यादा
अपने
आप
से
हैं
वरना
मुझ
में
तो
कोई
भी
कमी
नइँ
कभी
चुप
रह
के
कितना
कहती
है
कभी
वो
बोलकर
भी
बोलती
नइँ
'प्रीत'
आज़ादी
ऐसी
जैसे
हो
क़ैद
क़ैद
ऐसी
जहाँ
गिरफ़्तगी
नइँ
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Prit
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