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Prit
vo poochte hain itni ghazlein kahaan se aayi
vo poochte hain itni ghazlein kahaan se aayi | वो पूछते हैं इतनी ग़ज़लें कहाँ से आई
- Prit
वो
पूछते
हैं
इतनी
ग़ज़लें
कहाँ
से
आई
कैसे
कहूँ
कि
ये
सब
तेरा
कमाल
है
जाँ
- Prit
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एक
नया
'आशिक़
है
उसका,
जान
छिड़कता
है
उसपर
मुझको
डर
है
वो
भी
इक
दिन
मय-ख़ाने
से
निकलेगा
Siddharth Saaz
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इश्क़
माशूक़
इश्क़
'आशिक़
है
यानी
अपना
ही
मुब्तला
है
इश्क़
Meer Taqi Meer
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रहते
थे
कभी
जिन
के
दिल
में
हम
जान
से
भी
प्यारों
की
तरह
बैठे
हैं
उन्हीं
के
कूचे
में
हम
आज
गुनहगारों
की
तरह
Majrooh Sultanpuri
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क़ल्ब-ए-हज़ी
मता-ए-जाँ
यूँँ
शाद
कीजिए
कसरत
के
साथ
आप
हमें
याद
कीजिए
दौलत
में
चाहते
हो
इज़ाफा
अगर
शजर
तो
बेकसों
यतीमों
की
इमदाद
कीजिए
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Shajar Abbas
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सुनो
हर-वक़्त
इतना
याद
भी
मत
कीजिए
हमको
कहीं
ऐसा
न
हो
की
हिचकियों
में
जाँ
निकल
जाए
Sandeep dabral 'sendy'
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पहले
तो
तुम्हें
जान
पुकारेंगे
यही
लोग
फिर
ख़ुद
ही
तुम्हें
जान
से
मारेंगे
यही
लोग
मुँह
पर
तो
बड़े
फ़ख्र
से
ता'ईद
करेंगे
फिर
पीठ
में
खंज़र
भी
उतारेंगे
यही
लोग
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Ashraf Ali
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तेरा
पीछा
करते
करते
जाने
क्यूँ
मैं
दुनियादारी
से
पीछे
छूट
गया
तूने
तो
ऐ
जान
महज़
दिल
तोड़ा
था
तू
क्या
जाने
मैं
अंदर
तक
टूट
गया
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Ritesh Rajwada
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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गर
उदासी,
चिड़चिड़ापन,
जान
देना
प्यार
है
माफ़
करना,
काम
मुझको
और
भी
हैं
दोस्तो
Divy Kamaldhwaj
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ये
हक़ीक़त
है,
मज़हका
नहीं
है
वो
बहुत
दूर
है,
जुदा
नहीं
है
तेरे
होंटों
पे
रक़्स
करता
है
राज़
जो
अब
तलक
खुला
नहीं
है
जान
ए
जांँ
तेरे
हुस्न
के
आगे
ये
जो
शीशा
है,
आइना
नहीं
है
क्यूँ
शराबोर
हो
पसीने
में
मैं
ने
बोसा
अभी
लिया
नहीं
है
उस
का
पिंदार
भी
वहीं
का
वहीं
मेरे
लब
पर
भी
इल्तेजा
नहीं
है
जो
भी
होना
था
हो
चुका
काज़िम
अब
किसी
से
हमें
गिला
नहीं
है
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Kazim Rizvi
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कोई
हैरत
न
होगी
बे-वफ़ा
निकली
वो
साधारण
सी
लड़की
बे-वफ़ा
निकली
वो
तेरी
भी
थी
वो
मेरी
भी
थी
तो
अब
कहें
क्या
किसकी
वाली
बे-वफ़ा
निकली
मुझे
बाकी
सभी
का
तो
पता
था
प्रीत
मगर
तू
यार
तू
भी
बे-वफ़ा
निकली
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Prit
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हम
अब
भी
पागलों
जैसे
झगड़ते
हैं
हमारे
बीच
अब
भी
कुछ
बचा
है
क्या
Prit
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यूँँ
भी
नाकाम
किया
ज़िंदगी
को
उम्र
भर
काम
ही
करते
रहे
हम
Prit
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शायद
उसने
कभी
वफ़ा
की
ही
नइँ
जो
ये
कहता
है
आँखें
बोलती
नइँ
किसी
पे
इक
दफ़ा
दिल
आ
जाए
बंदा
क्या
फिर
तो
रब
की
चलती
नइँ
तेरी
ख़ामोशी
भी
सुनी
मैं
ने
तू
ने
आवाज़
भी
मेरी
सुनी
नइँ
घर
से
दफ़्तर
तलक
सफ़र
है
सिर्फ़
मौत
है
जानी
फिर
ये
ज़िंदगी
नइँ
उसको
कैसे
बुरी
लगी
मेरी
बात
बात
भी
वो
कभी
जो
मैं
ने
की
नइँ
उसे
बिन
देखें
देख
लेते
हैं
हम
वो
हमें
देखकर
भी
देखती
नइँ
आप
कुछ
ज़्यादा
अपने
आप
से
हैं
वरना
मुझ
में
तो
कोई
भी
कमी
नइँ
कभी
चुप
रह
के
कितना
कहती
है
कभी
वो
बोलकर
भी
बोलती
नइँ
'प्रीत'
आज़ादी
ऐसी
जैसे
हो
क़ैद
क़ैद
ऐसी
जहाँ
गिरफ़्तगी
नइँ
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Prit
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वो
मेरी
फाल्गुनी,
मैं
उसका
माँझी
हूँ
मैं
शब्दों
से
ग़ज़लों
के
पर्वत
खोदूँगा
Prit
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