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Meer Taqi Meer
ishq maashooq ishq 'aashiq hai
ishq maashooq ishq 'aashiq hai | इश्क़ माशूक़ इश्क़ 'आशिक़ है
- Meer Taqi Meer
इश्क़
माशूक़
इश्क़
'आशिक़
है
यानी
अपना
ही
मुब्तला
है
इश्क़
- Meer Taqi Meer
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इश्क़
तिरी
इंतिहा
इश्क़
मिरी
इंतिहा
तू
भी
अभी
ना-तमाम
मैं
भी
अभी
ना-तमाम
Allama Iqbal
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सूख
जाता
जल्द
है
फिर
भी
निशानी
के
लिए
फूल
इक
छुप
के
किताबों
में
छिपाना
इश्क़
है
Parul Singh "Noor"
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अगर
बेदाग़
होता
चाँद
तो
अच्छा
नहीं
लगता
मोहब्बत
ख़ूब-सूरत
दाग़
है,
बेदाग़
से
दिल
पर
Umesh Maurya
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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मोहब्बत
करने
वाले
कम
न
होंगे
तिरी
महफ़िल
में
लेकिन
हम
न
होंगे
Hafeez Hoshiarpuri
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रोज़
मिलने
पे
भी
लगता
था
कि
जुग
बीत
गए
इश्क़
में
वक़्त
का
एहसास
नहीं
रहता
है
Ahmad Mushtaq
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मज़ा
चहिए
जो
आख़िर
तक
उदासी
से
मोहब्बत
कर
ख़ुशी
का
क्या
है
कब
तब्दील
है
से
थी
में
हो
जाए
Atul K Rai
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राह-ए-दूर-ए-इश्क़
में
रोता
है
क्या
आगे
आगे
देखिए
होता
है
क्या
Meer Taqi Meer
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मुझ
में
थोड़ी
सी
जगह
भी
नहीं
नफ़रत
के
लिए
मैं
तो
हर
वक़्त
मोहब्बत
से
भरा
रहता
हूँ
Mirza Athar Zia
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प्यार-मोहब्बत
सीधे-सादे
रस्ते
हैं
कोई
इन
पर
चलने
को
तैयार
नहीं
Ashok Rawat
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होता
है
याँ
जहाँ
में
हर
रोज़-ओ-शब
तमाशा
देखा
जो
ख़ूब
तो
है
दुनिया
अजब
तमाशा
हर
चंद
शोर-ए-महशर
अब
भी
है
दर
पे
लेकिन
निकलेगा
यार
घर
से
होवेगा
जब
तमाशा
भड़के
है
आतिश-ए-ग़म
मंज़ूर
है
जो
तुझ
को
जलने
का
आशिक़ों
के
आ
देख
अब
तमाशा
तालेअ'
जो
मीर
ख़्वारी
महबूब
को
ख़ुश
आई
पर
ग़म
ये
है
मुख़ालिफ़
देखेंगे
सब
तमाशा
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Meer Taqi Meer
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गुज़र
जान
से
और
डर
कुछ
नहीं
रह-ए-इश्क़
में
फिर
ख़तर
कुछ
नहीं
है
अब
काम
दिल
जिस
पे
मौक़ूफ़
तो
वो
नाला
कि
जिस
में
असर
कुछ
नहीं
हुआ
माइल
उस
सर्व
का
दिल
मिरा
ब-जुज़
जौर
जिस
से
समर
कुछ
नहीं
न
कर
अपने
महवों
का
हरगिज़
सुराग़
गए
गुज़रे
बस
अब
ख़बर
कुछ
नहीं
तिरी
हो
चुकी
ख़ुश्क
मिज़्गाँ
की
सब
लहू
अब
जिगर
में
मगर
कुछ
नहीं
हया
से
नहीं
पुश्त-ए-पा
पर
वो
चश्म
मिरा
हाल
मद्द-ए-नज़र
कुछ
नहीं
करूँँ
क्यूँँके
इंकार
इश्क़
आह
में
ये
रोना
भला
क्या
है
गर
कुछ
नहीं
कमर
उस
की
रश्क
रग-ए-जाँ
है
'मीर'
ग़रज़
इस
से
बारीक-तर
कुछ
नहीं
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Meer Taqi Meer
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दिल
वो
नगर
नहीं
कि
फिर
आबाद
हो
सके
पछताओगे
सुनो
हो
ये
बस्ती
उजाड़
कर
Meer Taqi Meer
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हमारे
आगे
तिरा
जब
किसू
ने
नाम
लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा
को
हम
ने
थाम
थाम
लिया
Meer Taqi Meer
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दिल-ख़राशी-ओ-जिगर-चाकी-ओ-ख़ूँ-अफ़्शानी
हूँ
तो
नाकाम
प
रहते
हैं
मुझे
काम
बहुत
Meer Taqi Meer
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