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Prit
vo meri faalguni main uskaa maanjhi hooñ
vo meri faalguni main uskaa maanjhi hooñ | वो मेरी फाल्गुनी, मैं उसका माँझी हूँ
- Prit
वो
मेरी
फाल्गुनी,
मैं
उसका
माँझी
हूँ
मैं
शब्दों
से
ग़ज़लों
के
पर्वत
खोदूँगा
- Prit
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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धूप
के
एक
ही
मौसम
ने
जिन्हें
तोड़
दिया
इतने
नाज़ुक
भी
ये
रिश्ते
न
बनाये
होते
Waseem Barelvi
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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हम
क्या
जानें
जन्नत
कैसी
होती
है
उस
सेे
पूछो
जिसने
तुमको
पाया
है
Harsh saxena
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दरिया
के
किनारे
पे
मिरी
लाश
पड़ी
थी
और
पानी
की
तह
में
वो
मुझे
ढूँड
रहा
था
Adil Mansuri
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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आँख
भर
आई
किसी
से
जो
मुलाक़ात
हुई
ख़ुश्क
मौसम
था
मगर
टूट
के
बरसात
हुई
Manzar Bhopali
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तू
किसी
और
ही
दुनिया
में
मिली
थी
मुझ
सेे
तू
किसी
और
ही
मौसम
की
महक
लाई
थी
डर
रहा
था
कि
कहीं
ज़ख़्म
न
भर
जाएँ
मेरे
और
तू
मुट्ठियाँ
भर-भर
के
नमक
लाई
थी
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Tehzeeb Hafi
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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मुफ़्त
की
शय
की
कोई
क्यूँँकर
करे
इज़्ज़त
भला
दरिया
की
क़ीमत
वो
जाने
जिसने
सहरा
देखा
है
Prit
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ठहर
जाता
है
दिल
धड़क
जाता
हूँ
मैं
वो
जब
प्यार
से
नाम
लेता
है
मेरा
Prit
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तुम्हें
ये
सोचकर
भी
ख़ुश
रहा
करना
है
'प्रीत'
कोई
है
जो
तुम्हें
ख़ुश
देखकर
ख़ुश
होता
है
Prit
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उसका
बोसा
लिया
तो
ये
जाना
चाय
से
ज़्यादा
मीठा
भी
कुछ
है
Prit
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कोई
हैरत
न
होगी
बे-वफ़ा
निकली
वो
साधारण
सी
लड़की
बे-वफ़ा
निकली
वो
तेरी
भी
थी
वो
मेरी
भी
थी
तो
अब
कहें
क्या
किसकी
वाली
बे-वफ़ा
निकली
मुझे
बाकी
सभी
का
तो
पता
था
प्रीत
मगर
तू
यार
तू
भी
बे-वफ़ा
निकली
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Prit
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