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Subhadeep Chattapadhay
aankh men tire jo ye hamesha chehra dikhta hai
aankh men tire jo ye hamesha chehra dikhta hai | आँख में तिरे जो ये हमेशा चेहरा दिखता है
- Subhadeep Chattapadhay
आँख
में
तिरे
जो
ये
हमेशा
चेहरा
दिखता
है
मेरा
था
नहीं
कभी
वो
और
ही
किसी
का
है
- Subhadeep Chattapadhay
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तुम्हारा
काम
इतना
है
कि
बस
काजल
लगा
लेना
तुम्हारी
आँख
की
ख़ातिर
नज़ारे
मैं
बनाऊँगा
Khalid Nadeem Shani
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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फिर
किसी
के
सामने
चश्म-ए-तमन्ना
झुक
गई
शौक़
की
शोख़ी
में
रंग-ए-एहतराम
आ
ही
गया
Asrar Ul Haq Majaz
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लाई
न
ऐसों-वैसों
को
ख़ातिर
में
आज
तक
ऊँची
है
किस
क़दर
तिरी
नीची
निगाह
भी
Firaq Gorakhpuri
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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इक
नज़र
उस
चेहरे
की
देखी
है
जब
से
यार
मुँह
उतरा
हुआ
है
रौशनी
का
Harsh saxena
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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नज़र
में
रखना
कहीं
कोई
ग़म
शनास
गाहक
मुझे
सुख़न
बेचना
है
ख़र्चा
निकालना
है
Umair Najmi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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मुझे
तो
उसका
भीतरी
ग़ुबार
है
निकालना
सो
आँख
चूमता
हूँ
उसके
होंठ
चूमता
नहीं
Siddharth Saaz
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रह
गया
इस
ज़मीं
में
कहीं
तन्हा
मैं
थे
मरे
तुम
कहाँ
वो
मुझे
बोल
दो
Subhadeep Chattapadhay
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ज़िद
लिए
मैं
रहा
बैठा
हर
दिन
सामने
मेरे
चौराहा
हर
दिन
राह
पे
बैठा
आख़िर
मैं
कब
हूँ
आसमाँ
पर
ही
जा
बैठा
हर
दिन
जन्म
को
मरने
को
इक
मिला
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
ज़िंदा
हर
दिन
धर्म
अब
कट
चुका
इस
जहाँ
में
तुमने
ही
तो
उसे
काटा
हर
दिन
ख़ुद
ख़ुदा
डर
रहा
आने
को
अब
बढ़
रहा
बास
जो
डर
का
हर
दिन
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Subhadeep Chattapadhay
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ज़रा
पेड़
को
और
सूखा
बना
दूँ
गरजते
दिखा
मेघ
भूखा
बना
दूँ
Subhadeep Chattapadhay
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जल
गए
वो
सभी
जिनको
थी
इक
ज़बाँ
मैं
ही
क्यूँ
बच
गया
वो
मुझे
बोल
दो
Subhadeep Chattapadhay
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ग़ज़ल
में
यूँँ
ही
नाम
मैं
भर
गया
तिरा
नाम
ही
सिर्फ़
बन
पर
गया
यूँँ
खोजे
तू
ज़िंदा
मुझे
सब
जगह
मैं
तो
ज़िंदगी
से
ही
हूँ
डर
गया
हरा
पेड़
बचपन
की
ही
याद
है
समय
आते
ही
ये
भी
झड़
पर
गया
क़लम
को
घड़ी
सौंप
आराम
है
समय
पर
तिरा
नाम
लिख
कर
गया
ये
जो
ख़्वाब
था
पानी
सा
साफ़
था
कि
क़िस्मत
बुरी
पानी
सड़
मर
गया
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Subhadeep Chattapadhay
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