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Parvez Zaami
kuchh na kuchh to nisbat hai
kuchh na kuchh to nisbat hai | कुछ न कुछ तो निस्बत है
- Parvez Zaami
कुछ
न
कुछ
तो
निस्बत
है
बैर
है
या
उल्फ़त
है
हश्र
का
ये
दिन
और
तुम
क्या
हसीं
क़यामत
है
रंज
क्यूँँ
करे
इस
पर
अपनी
अपनी
क़िस्मत
है
कोई
तो
कहे
मुझ
से
आप
से
मोहब्बत
है
मय-कदा
भी
मंदिर
है
साक़ी
उस
की
मूरत
है
ईद
मेरी
हो
जाए
चाँद
की
ज़रूरत
है
ज़ीस्त
तू
जिसे
कहता
चार-दिन
की
मोहलत
है
ज़िंदगी
फ़साना
है
मौत
ही
हक़ीक़त
है
आते
रहना
तुर्बत
पर
आख़िरी
वसीयत
है
ये
ग़ज़ल
नहीं
'ज़ामी'
ज़िंदगी
की
दौलत
है
आ
गया
ख़ुदा
का
ख़त
'ज़ामी'
की
ज़रूरत
है
- Parvez Zaami
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ज़िंदगी
क्या
किसी
मुफ़लिस
की
क़बा
है
जिस
में
हर
घड़ी
दर्द
के
पैवंद
लगे
जाते
हैं
Faiz Ahmad Faiz
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जब
से
हुआ
है
कंधे
से
बस्ते
का
बोझ
कम
बढ़ते
ही
जा
रहे
हैं
मेरी
ज़िंदगी
में
ग़म
Ankit Maurya
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जुदा
हुए
हैं
बहुत
लोग
एक
तुम
भी
सही
अब
इतनी
बात
पे
क्या
ज़िंदगी
हराम
करें
Nasir Kazmi
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हर
एक
काम
है
धोका
हर
एक
काम
है
खेल
कि
ज़िंदगी
में
तमाशा
बहुत
ज़रूरी
है
Khaleel Mamoon
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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ज़िंदगी
तू
ने
मुझे
क़ब्र
से
कम
दी
है
ज़मीं
पाँव
फैलाऊँ
तो
दीवार
में
सर
लगता
है
Bashir Badr
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आधी
आधी
रात
तक
सड़कों
के
चक्कर
काटिए
शा'इरी
भी
इक
सज़ा
है
ज़िंदगी
भर
काटिए
कोई
तो
हो
जिस
से
उस
ज़ालिम
की
बातें
कीजिए
चौदहवीं
का
चाँद
हो
तो
रात
छत
पर
काटिए
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Nisar Nasik
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हाल
मत
पूछो
हमारी
ज़िंदगी
का
एक
चलती-फिरती
सी
दीवार
है
बस
Rachit Sonkar
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तंग
आ
चुके
हैं
कशमकश-ए-ज़िंदगी
से
हम
ठुकरा
न
दें
जहाँ
को
कहीं
बे-दिली
से
हम
Sahir Ludhianvi
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बद-हवा
सेी
है
बे-ख़याली
है
क्या
ये
हालत
भी
कोई
हालत
है
ज़िंदगी
से
है
जंग
शाम-ओ-सहर
मौत
से
शिकवा
है
शिकायत
है
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Chandan Sharma
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आबरू
बज़्म
की
हमीं
से
है
बज़्म
में
हम
नहीं
तो
कुछ
भी
नहीं
Parvez Zaami
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जब
तलक
सूरज
को
ग्रहण
लगे
'ज़ामी'
चाँद
का
क़िस्सा
सुनाओ
अँधेरा
है
Parvez Zaami
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मैं
तो
मुश्ताक़
हूँ
उस
दिन
का
अज़ल
से
'ज़ामी'
कब
बपा
हश्र
हो
कब
उन
का
मैं
जल्वा
देखूँ
Parvez Zaami
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ज़िंदगी
नाम
है
अज़िय्यत
का
ज़ीस्त
में
ग़म
नहीं
तो
कुछ
भी
नहीं
Parvez Zaami
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तुम
को
मैं
बा-ख़िरद
समझता
था
तुम
तो
अच्छा
सा
मशवरा
देते
Parvez Zaami
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