kuchh na kuchh to nisbat hai | कुछ न कुछ तो निस्बत है

  - Parvez Zaami
कुछकुछतोनिस्बतहै
बैरहैयाउल्फ़तहै
हश्रकायेदिनऔरतुम
क्याहसींक़यामतहै
रंजक्यूँँकरेइसपर
अपनीअपनीक़िस्मतहै
कोईतोकहेमुझसे
आपसेमोहब्बतहै
मय-कदाभीमंदिरहै
साक़ीउसकीमूरतहै
ईदमेरीहोजाए
चाँदकीज़रूरतहै
ज़ीस्ततूजिसेकहता
चार-दिनकीमोहलतहै
ज़िंदगीफ़सानाहै
मौतहीहक़ीक़तहै
आतेरहनातुर्बतपर
आख़िरीवसीयतहै
येग़ज़लनहीं'ज़ामी'
ज़िंदगीकीदौलतहै
गयाख़ुदाकाख़त
'ज़ामी'कीज़रूरतहै
  - Parvez Zaami
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy