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Parvez Zaami
tum ko main ba-khird samajhta tha
tum ko main ba-khird samajhta tha | तुम को मैं बा-ख़िरद समझता था
- Parvez Zaami
तुम
को
मैं
बा-ख़िरद
समझता
था
तुम
तो
अच्छा
सा
मशवरा
देते
- Parvez Zaami
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बिछड़ने
का
इरादा
है
तो
मुझ
से
मशवरा
कर
लो
मोहब्बत
में
कोई
भी
फ़ैसला
ज़ाती
नहीं
होता
Afzal Khan
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हम
तो
समझे
थे
कि
इक
ज़ख़्म
है
भर
जाएगा
क्या
ख़बर
थी
कि
रग-ए-जाँ
में
उतर
जाएगा
Parveen Shakir
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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क्या
ख़बर
कौन
था
वो,
और
मेरा
क्या
लगता
था
जिस
सेे
मिलकर
मुझे,
हर
शख़्स
बुरा
लगता
था
Tehzeeb Hafi
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मुझको
ख़बर
हुई
न
लहद
आ
गई
क़रीब
किस
तर
हाँ
बढ़
रही
है
ये
रफ़्तारें
ज़िंदगी
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''Akbar Rizvi"
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तुम
न
आए
तो
क्या
सहर
न
हुई
हाँ
मगर
चैन
से
बसर
न
हुई
मेरा
नाला
सुना
ज़माने
ने
एक
तुम
हो
जिसे
ख़बर
न
हुई
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Mirza Ghalib
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तुम
पर
इक
दिन
मरते
मरते
मर
जाना
है,
दीवाने
को
कहाँ
ख़बर
है
घर
जाना
है
एक
शब्द
तुमको
अंधेरे
का
खौफ़
दिलाकर,
बाद
में
ख़ुद
भी
जान
बूझकर
डर
जाना
है
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Vishal Singh Tabish
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किसे
ख़बर
वो
मोहब्बत
थी
या
रक़ाबत
थी
बहुत
से
लोग
तुझे
देख
कर
हमारे
हुए
Ahmad Faraz
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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मुझे
ख़बर
नहीं
ग़म
क्या
है
और
ख़ुशी
क्या
है
ये
ज़िंदगी
की
है
सूरत
तो
ज़िंदगी
क्या
है
Shadan Ahsan Marehrvi
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जानाँ
अफ़सोस
मेरी
मय्यत
पर
थोड़ा
सा
तो
जता
दिया
होता
Parvez Zaami
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हम
क़लंदर-मिज़ाज
हैं
'ज़ामी'
हम
कनाअत-शिआर
होते
हैं
Parvez Zaami
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चल
दर-ए-यार
देखा
जाएगा
छोड़
ये
आर
देखा
जाएगा
इक
दफ़ा
कर
ही
लेते
हैं
उस
के
हुस्न
से
प्यार
देखा
जाएगा
इतनी
संजीदगी
भी
ठीक
नहीं
चलिए
सरकार
देखा
जाएगा
डाल
कर
आँख
उस
की
आँखों
में
कर
दो
इज़हार
देखा
जाएगा
फ़िल्म
रोज़-ए-जज़ा
चलेगी
जब
सब
का
किरदार
देखा
जाएगा
मय
की
मिक़दार
तो
नहीं
साक़ी
पर
तिरा
प्यार
देखा
जाएगा
बस
बहुत
सह
लिए
सितम
'ज़ामी'
उठा
तलवार
देखा
जाएगा
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Parvez Zaami
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ऐ
न
जा
दिल-नशीन
छोड़
के
दिल
विनती
करता
है
हाथ
जोड़
के
दिल
तेरे
जाने
के
बाद
जान-ए-दिल
रख
लिया
हम
ने
तो
सिकोड़
के
दिल
है
गुनाह-ए-अज़ीम
दिल-शिकनी
ओ
ख़ुदारा
न
जाओ
तोड़
के
दिल
कुछ
न
निकलेगा
तेरे
ग़म
के
ब-जुज़
देख
लेना
नहीं
निचोड़
के
दिल
क्या
सुबूत-ए-वफ़ा
दें
तुझ
को
हम
पास
कुछ
भी
नहीं
है
छोड़
के
दिल
कैसे
'ज़ामी'
कटेगी
आज
की
शब
वो
सर-ए-शब
गए
हैं
तोड़
के
दिल
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Parvez Zaami
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इक
गली
दरमियान
पड़ती
है
फिर
ख़ुदी
दरमियान
पड़ती
है
कर
तो
दें
तर्क-ए-मय-कशी
वाइज़
तिश्नगी
दरमियान
पड़ती
है
जी
तो
करता
है
छेड़
लूँ
उस
को
सादगी
दरमियान
पड़ती
है
दूरियाँ
हसरतों
से
है
इतनी
मुफ़्लिसी
दरमियान
पड़ती
है
राह-ए-मुल्क-ए-अदम
नहीं
आसाँ
ज़िंदगी
दरमियान
पड़ती
है
शौक़-ए-इज़हार
तो
है
पर
'ज़ामी'
दोस्ती
दरमियान
पड़ती
है
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Parvez Zaami
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