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Parvez Zaami
ai na ja dil-nasheen chhod ke dil
ai na ja dil-nasheen chhod ke dil | ऐ न जा दिल-नशीन छोड़ के दिल
- Parvez Zaami
ऐ
न
जा
दिल-नशीन
छोड़
के
दिल
विनती
करता
है
हाथ
जोड़
के
दिल
तेरे
जाने
के
बाद
जान-ए-दिल
रख
लिया
हम
ने
तो
सिकोड़
के
दिल
है
गुनाह-ए-अज़ीम
दिल-शिकनी
ओ
ख़ुदारा
न
जाओ
तोड़
के
दिल
कुछ
न
निकलेगा
तेरे
ग़म
के
ब-जुज़
देख
लेना
नहीं
निचोड़
के
दिल
क्या
सुबूत-ए-वफ़ा
दें
तुझ
को
हम
पास
कुछ
भी
नहीं
है
छोड़
के
दिल
कैसे
'ज़ामी'
कटेगी
आज
की
शब
वो
सर-ए-शब
गए
हैं
तोड़
के
दिल
- Parvez Zaami
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शिकस्ता
दिल
शब-ए-ग़म
दर्द
रुसवाई
अरे
इतना
तो
चलता
है
मुहब्बत
में
Sapna Moolchandani
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चराग़ों
को
आँखों
में
महफ़ूज़
रखना
बड़ी
दूर
तक
रात
ही
रात
होगी
Bashir Badr
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शब
भर
इक
आवाज़
बनाई
सुब्ह
हुई
तो
चीख़
पड़े
रोज़
का
इक
मामूल
है
अब
तो
ख़्वाब-ज़दा
हम
लोगों
का
Abhishek shukla
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जागना
और
जगा
के
सो
जाना
रात
को
दिन
बना
के
सो
जाना
Ali Zaryoun
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रात
हो,
चाँद
हो,
बारिश
भी
हो
और
तुम
भी
हो
ऐसा
मुमकिन
ही
नहीं
है
कि
कभी
हो
मिरे
साथ
Faiz Ahmad
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रात
का
इंतिज़ार
कौन
करे
आज
कल
दिन
में
क्या
नहीं
होता
Bashir Badr
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रात
भर
उन
का
तसव्वुर
दिल
को
तड़पाता
रहा
एक
नक़्शा
सामने
आता
रहा
जाता
रहा
Akhtar Shirani
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कब
ठहरेगा
दर्द
ऐ
दिल
कब
रात
बसर
होगी
सुनते
थे
वो
आएँगे
सुनते
थे
सहर
होगी
Faiz Ahmad Faiz
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कल
चौदहवीं
की
रात
थी
शब
भर
रहा
चर्चा
तिरा
कुछ
ने
कहा
ये
चाँद
है
कुछ
ने
कहा
चेहरा
तिरा
Ibn E Insha
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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सुर्ख़-फूलों
के
हार
हैं
हम
लोग
लोग
कहते
हैं
ख़ार
हैं
हम
लोग
अपने
ख़ूँ
से
चमन
को
सींचा
है
फिर
भी
बे-ऐतिबार
हैं
हम
लोग
सर-ज़मीन-ए-वतन
गवाह
रहे
मुल्क
के
पासदार
हैं
हम
लोग
चश्म-ए-बद-बीन
से
न
देख
हमें
यार
उल्फ़त-शिआर
हैं
हम
लोग
हम
गदा
हैं
रसूल-ए-अरबी
के
वाक़ई
ताजदार
हैं
हम
लोग
हम
से
ही
रौनक़-ए-चमन
'ज़ामी'
सच
है
जान-ए-बहार
हैं
हम
लोग
लोग
कुछ
भी
कहें
मगर
'ज़ामी'
बा-सफ़ा
बा-वक़ार
हैं
हम
लोग
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Parvez Zaami
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कहते
हैं
लोग
जिस
को
सनम
बादा-ए-इरम
वो
तो
तिरे
लबों
की
हलावत
का
नाम
है
Parvez Zaami
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आप
की
इल्तिफ़ात
है
साक़ी
रक़्स
में
जो
हयात
है
साक़ी
Parvez Zaami
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महताब
तेरे
रुख़
की
ज़ियारत
का
नाम
है
सिंदूर
तेरी
माँग
का
उल्फ़त
का
नाम
है
Parvez Zaami
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इक
गली
दरमियान
पड़ती
है
फिर
ख़ुदी
दरमियान
पड़ती
है
कर
तो
दें
तर्क-ए-मय-कशी
वाइज़
तिश्नगी
दरमियान
पड़ती
है
जी
तो
करता
है
छेड़
लूँ
उस
को
सादगी
दरमियान
पड़ती
है
दूरियाँ
हसरतों
से
है
इतनी
मुफ़्लिसी
दरमियान
पड़ती
है
राह-ए-मुल्क-ए-अदम
नहीं
आसाँ
ज़िंदगी
दरमियान
पड़ती
है
शौक़-ए-इज़हार
तो
है
पर
'ज़ामी'
दोस्ती
दरमियान
पड़ती
है
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Parvez Zaami
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