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Mohit Subran
zaroorat kya tijaarat-gaar ko khud haath rangne ki
zaroorat kya tijaarat-gaar ko khud haath rangne ki | ज़रूरत क्या तिजारत-गार को ख़ुद हाथ रँगने की
- Mohit Subran
ज़रूरत
क्या
तिजारत-गार
को
ख़ुद
हाथ
रँगने
की
ठिकाने
कुछ
लगाना
हो
अगर
सरकार
बैठी
है
- Mohit Subran
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मुक़ाबिल
फ़ासलों
से
ही
मोहब्बत
डूब
जाएगी
सुनोगी
झूठी
बातें
तुम
हक़ीक़त
डूब
जाएगी
चलेगी
तब
तलक
जब
तक
तिरी
परछाईं
देखेगी
तिरा
जब
हुस्न
देखेगी
सियासत
डूब
जाएगी
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Anurag Pandey
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हमारे
ख़ौफ़
से
बाज़ार
उछलते
हैं
जहाँ
भर
में
सिसकने
से
हमारे
कौन
सी
सरकार
गिरती
है
Nomaan Shauque
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इन
से
उम्मीद
न
रख
हैं
ये
सियासत
वाले
ये
किसी
से
भी
मोहब्बत
नहीं
करने
वाले
Nadim Nadeem
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दो
मुल्कों
के
सियासी
खेल
में
जाने
यहाँ
पर
कितनों
के
घर
उजड़े
हैं
मौला
वही
हर
सुब्ह
मंज़र
देखना
पड़ता
हज़ारों
लोग
यूँँ
ही
मरते
हैं
मौला
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Harsh saxena
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वो
हिंदू,
मैं
मुस्लिम,
ये
सिक्ख,
वो
ईसाई
यार
ये
सब
सियासत
है
चलो
इश्क़
करें
Rahat Indori
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कितना
दुश्वार
है
जज़्बों
की
तिजारत
करना
एक
ही
शख़्स
से
दो
बार
मोहब्बत
करना
जिस
को
तुम
चाहो
कोई
और
न
चाहे
उस
को
इस
को
कहते
हैं
मोहब्बत
में
सियासत
करना
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Liaqat Jafri
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ऐसा
नहीं
बस
आज
तुझे
प्यार
करेंगे
ता'उम्र
यही
काम
लगातार
करेंगे
सरकार
करेगी
नहीं
इस
देश
का
उद्धार
उद्धार
करेंगे
तो
कलाकार
करेंगे
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Tanoj Dadhich
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दीवार
उठाने
की
तिजारत
नहीं
आई
दिल्ली
में
रहे
और
सियासत
नहीं
आई
बिकने
को
तो
दिल
बिक
गया
बाज़ार
में
लेकिन
जो
आप
बताते
थे
वो
क़ीमत
नहीं
आई
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Obaid Azam Azmi
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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मैं
भूल
चुका
हूँ
कि
ये
वनवास
है
वन
है
इस
वक़्त
मेरे
सामने
सोने
का
हिरन
है
मैं
ध्यान
से
कुछ
सुन
ही
नहीं
पाऊँगा
सरकार
मैं
क्या
ही
बताऊँ
कि
मेरा
ध्यान
मगन
है
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Vikram Gaur Vairagi
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एक
ही
तो
दुख
है
मुझ
को
और
मेरा
दुख
है
ये
साँस
का
जो
सिलसिला
है
हाए
रुकता
क्यूँ
नहीं
Mohit Subran
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सफ़र
ज़मीं
का
तमाम
होगा
सफ़र
फ़लक
का
करूँँगा
मैं
भी
यही
तो
अब
इक
ख़ुशी
बची
है
कि
एक
दिन
तो
मरूँगा
मैं
भी
Mohit Subran
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क़दम-क़दम
पे
बिछी
हैं
तो
ठोकरें
केवल
गरीबों
के
लिए
इक
बद-दुआ
है
ये
दुनिया
Mohit Subran
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कुछ
और
देर
हवा
में
कर्तब
दिखलाएगी
और
फिर
ये
मिट्टी,
मिट्टी
में
मिल
जाएगी
Mohit Subran
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ख़त्म
होने
को
सफ़र
अब
ज़िंदगी
का
लगता
है
ये
गुज़रता
लम्हा
है
जो
आख़िरी
सा
लगता
है
Mohit Subran
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