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Mohit Subran
khatm hone ko safar ab zindagi ka lagta hai
khatm hone ko safar ab zindagi ka lagta hai | ख़त्म होने को सफ़र अब ज़िंदगी का लगता है
- Mohit Subran
ख़त्म
होने
को
सफ़र
अब
ज़िंदगी
का
लगता
है
ये
गुज़रता
लम्हा
है
जो
आख़िरी
सा
लगता
है
- Mohit Subran
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मिरे
सलीक़े
से
मेरी
निभी
मोहब्बत
में
तमाम
उम्र
मैं
नाकामियों
से
काम
लिया
Meer Taqi Meer
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हर
एक
चौखट
खुली
हुई
थी
हर
इक
दरीचा
खुला
हुआ
था
कि
उसकी
आमद
पे
दर
यहाँ
तक
कि
बेघरों
का
खुला
हुआ
था
ये
तेरी
हम्म
ने
हमें
ही
उलझन
में
डाल
रक्खा
है
वरना
हम
पर
तमाम
साइंस
के
फ़लसफ़ों
का
हर
एक
चिट्ठा
खुला
हुआ
था
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Saad Ahmad
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चलता
रहने
दो
मियाँ
सिलसिला
दिलदारी
का
आशिक़ी
दीन
नहीं
है
कि
मुकम्मल
हो
जाए
Abbas Tabish
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ये
इश्क़-विश्क़
का
क़िस्सा
तमाम
हो
जाए
सफ़ेद
दाढ़ी
हवस
की
गुलाम
हो
जाए
जवान
लड़कियों
बूढ़ों
से
तुम
रहो
हुश्यार
न
जाने
कौन
कहाँ
आसाराम
हो
जाए
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Paplu Lucknawi
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अजीब
दर्द
का
रिश्ता
था
सब
के
सब
रोए
शजर
गिरा
तो
परिंदे
तमाम
शब
रोए
Tariq Naeem
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दिल
के
तमाम
ज़ख़्म
तेरी
हाँ
से
भर
गए
जितने
कठिन
थे
रास्ते
वो
सब
गुज़र
गए
Kumar Vishwas
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नहीं
है
लब
पे
दिखावे
का
भी
तबस्सुम
अब
हमें
किसी
ने
मुक़म्मल
उदास
कर
दिया
है
Amaan Haider
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सूरज
लिहाफ़
ओढ़
के
सोया
तमाम
रात
सर्दी
से
इक
परिंदा
दरीचे
में
मर
गया
Athar nasik
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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न
जाने
ख़त्म
हुई
कब
हमारी
आज़ादी
तअल्लुक़ात
की
पाबंदियाँ
निभाते
हुए
Azhar Iqbal
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यही
है
आरज़ू
अब
तो
कि
इस
चलती
कहानी
में
मिरा
किरदार
मर
जाए
कहानी
ख़त्म
हो
जाए
Mohit Subran
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जब
था
दरिया
तो
किनारे
बैठते
थे
सब
मिरे
और
जब
सहरा
हुआ
हूँ
सब
किनारा
कर
गए
Mohit Subran
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झुका
के
सर
अदब
से
सुन
रहा
हूँ
इन
की
बक-बक
उठा
के
सर
कि
अब
बतला
ही
दूँ
क्या
कौन
हूँ
मैं
Mohit Subran
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आँखों
के
कोनों
से
फिसली
और
पलकों
से
छूट
गई
नींद
भी
इक
धागे
जैसी
है
टूट
गई
तो
टूट
गई
Mohit Subran
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आप-अपने
में
ही
गुम
रहने
लगा
है
एक
ख़ाली-पन
यहाँ
उतरा
है
जब
से
दिल
मुकम्मल
ही
नहीं
महसूस
करता
कुछ
तो
है
जो
हाथ
से
छूटा
है
इस
के
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Mohit Subran
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