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Mohit Subran
tiri daulat ka jaadu hai jo tujh tak kheench laaya hai
tiri daulat ka jaadu hai jo tujh tak kheench laaya hai | तिरी दौलत का जादू है जो तुझ तक खींच लाया है
- Mohit Subran
तिरी
दौलत
का
जादू
है
जो
तुझ
तक
खींच
लाया
है
वगरना
भाई
मेरे
सुन
ये
तेरी
भी
नहीं
होती
- Mohit Subran
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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दिल
में
न
हो
जुरअत
तो
मोहब्बत
नहीं
मिलती
ख़ैरात
में
इतनी
बड़ी
दौलत
नहीं
मिलती
Nida Fazli
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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दौलत
शोहरत
बीवी
बच्चे
अच्छा
घर
और
अच्छे
दोस्त
कुछ
तो
है
जो
इन
के
बाद
भी
हासिल
करना
बाक़ी
है
कभी-कभी
तो
दिल
करता
है
चलती
रेल
से
कूद
पड़ूॅं
फिर
कहता
हूॅं
पागल
अब
तो
थोड़ा
रस्ता
बाक़ी
है
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Zia Mazkoor
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बढ़
के
इम्कान
से
नुक़्सान
उठाए
हुए
हैं
हम
मुहब्बत
में
बहुत
नाम
कमाए
हुए
हैं
मेरे
मौला
मुझे
ता'बीर
की
दौलत
दे
दे
मैंने
इक
शख़्स
को
कुछ
ख़्वाब
दिखाए
हुए
हैं
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Ejaz Tawakkal Khan
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शराब
खींची
है
सब
ने
ग़रीब
के
ख़ूँ
से
तू
अब
अमीर
के
ख़ूँ
से
शराब
पैदा
कर
तू
इंक़लाब
की
आमद
का
इंतिज़ार
न
कर
जो
हो
सके
तो
अभी
इंक़लाब
पैदा
कर
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Asrar Ul Haq Majaz
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दिल-लगी
में
हसरत-ए-दिल
कुछ
निकल
जाती
तो
है
बोसे
ले
लेते
हैं
हम
दो-चार
हँसते
बोलते
Munshi Amirullah Tasleem
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'हसरत'
की
भी
क़ुबूल
हो
मथुरा
में
हाज़िरी
सुनते
हैं
आशिक़ों
पे
तुम्हारा
करम
है
आज
Hasrat Mohani
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ये
उसकी
मोहब्बत
है
कि
रुकता
है
तेरे
पास
वरना
तेरी
दौलत
के
सिवा
क्या
है
तेरे
पास
Zia Mazkoor
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आज
फिर
दिल
में
तिरे
दीद
की
हसरत
जागी
काश
फिर
काम
कोई
तुझ
से
ज़रूरी
निकले
Nilofar Noor
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बह्र
का
इल्म
मात्रा
का
ज्ञान
शे'र
कहना
भी
है
गणित
जैसा
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उम्र
लग-भग
है
अब
ढही
जाती
इक
ख़लिश
दिल
में
पर
रही
जाती
एक
हद
होती
है
कि
सहने
की
अब
नहीं
ये
घुटन
सही
जाती
मन
को
भी
पढ़ने
की
करो
कोशिश
बात
हर
इक
नहीं
कही
जाती
कैसे
गुज़रेंगे
ख़ुश्कियों
के
दिन
ये
नमी
आँख
से
बही
जाती
तारी
रहती
ये
बे-ख़ुदी
लेकिन
ज़ेहन
से
मेरे
आगही
जाती
जो
कही
जा
चुकी,
सुनी
जा
चुकी
काश
वो
बात
अन-कही
जाती
बस
कि
नाम-ओ-निशान
मिट
जाए
अब
कि
ये
चाह
भी
रही
जाती
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Mohit Subran
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ढल
के
सूरज
में
बदलना
है
तुझे
इन
अँधेरों
को
निगलना
है
तुझे
Mohit Subran
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हर
इक
लम्हे
में
हम
हँसते
हुए
माना
नहीं
होते
मगर
ऐसे
भी
तो
रो
रो
के
यूँँ
ज़ाया'
नहीं
होते
बिता
तू
भी
रहा
है
ज़िन्दगी
तन्हाइयों
में
ही
अगर
हम
साथ
होते
आज
तो
तन्हा
नहीं
होते
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Mohit Subran
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रखो
उम्मीद
ज़िन्दा
साल
के
अंतिम
महीने
तक
वो
बिछड़ा
शख़्स
क्या
मालूम
मिल
जाए
दिसंबर
में
Mohit Subran
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