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Mohit Subran
umr lag-bhag hai ab dhaahi jaati
umr lag-bhag hai ab dhaahi jaati | उम्र लग-भग है अब ढही जाती
- Mohit Subran
उम्र
लग-भग
है
अब
ढही
जाती
इक
ख़लिश
दिल
में
पर
रही
जाती
एक
हद
होती
है
कि
सहने
की
अब
नहीं
ये
घुटन
सही
जाती
मन
को
भी
पढ़ने
की
करो
कोशिश
बात
हर
इक
नहीं
कही
जाती
कैसे
गुज़रेंगे
ख़ुश्कियों
के
दिन
ये
नमी
आँख
से
बही
जाती
तारी
रहती
ये
बे-ख़ुदी
लेकिन
ज़ेहन
से
मेरे
आगही
जाती
जो
कही
जा
चुकी,
सुनी
जा
चुकी
काश
वो
बात
अन-कही
जाती
बस
कि
नाम-ओ-निशान
मिट
जाए
अब
कि
ये
चाह
भी
रही
जाती
- Mohit Subran
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ज़रा
सा
चूक
गया
मैं
तुझे
समझने
में
वगरना
ज़ीस्त
तिरी
धज्जियाँ
उड़ाता
मैं
Mohit Subran
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खेल
ये
टी
आर
पी
का
एक
दिन
तुम
देखना
मुल्क
में
कोई
भयानक
हादसा
करवाएगा
Mohit Subran
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देखे
हैं
तेरे
जल्वे
भी
लेकिन
हम
तेरी
सादगी
पे
मरते
हैं
Mohit Subran
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अच्छी
नहीं
हुई
जो
शुरुआत
क्या
हुआ
उम्मीद
रख
उमीद
पे
दुनिया-जहान
है
Mohit Subran
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मज़हब
का
एंगल
लाते
हैं
दोनों
तबक़े
गर्माते
हैं
हिन्दू-मुस्लिम
लड़वाते
हैं
हिन्दू-मुस्लिम
लड़
जाते
हैं
केवल
दंगे
भड़काते
हैं
रोटी
ही
इस
की
खाते
हैं
रोज़
नया
इक
छोड़
शगूफ़ा
ये
लोगों
को
उलझाते
हैं
लिखते
हैं
इक
क़िस्सा
मिल
के
फिर
सब
चैनल
दोहराते
हैं
बात
नहीं
करते
मुद्दे
पे
बस
मुद्दे
से
भटकाते
हैं
सच्चाई
का
दावा
कर
के
झूठी
ख़बरें
फैलाते
हैं
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Mohit Subran
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