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Mohit Subran
pahan li hai tiri KHaatir tabassum ai zamaane
pahan li hai tiri KHaatir tabassum ai zamaane | पहन ली है तिरी ख़ातिर तबस्सुम ऐ ज़माने
- Mohit Subran
पहन
ली
है
तिरी
ख़ातिर
तबस्सुम
ऐ
ज़माने
उदासी
को
मिरी
तू
सह
न
पाया
चार
दिन
भी
- Mohit Subran
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इस
ख़ौफ़
में
कि
ख़ुद
न
भटक
जाएँ
राह
में
भटके
हुओं
को
राह
दिखाता
नहीं
कोई
Anwar Taban
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वही
मंज़िलें
वही
दश्त
ओ
दर
तिरे
दिल-ज़दों
के
हैं
राहबर
वही
आरज़ू
वही
जुस्तुजू
वही
राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
Noon Meem Rashid
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अपनी
तन्हाई
मिरे
नाम
पे
आबाद
करे
कौन
होगा
जो
मुझे
उस
की
तरह
याद
करे
Parveen Shakir
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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कल
जहाँ
दीवार
थी
है
आज
इक
दर
देखिए
क्या
समाई
थी
भला
दीवाने
के
सर
देखिए
Javed Akhtar
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हम
किसी
दर
पे
न
ठिटके
न
कहीं
दस्तक
दी
सैकड़ों
दर
थे
मिरी
जाँ
तिरे
दर
से
पहले
Ibn E Insha
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कोई
ख़ुद-कुशी
की
तरफ़
चल
दिया
उदासी
की
मेहनत
ठिकाने
लगी
Adil Mansuri
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तमाम
शहर
को
तारीकियों
से
शिकवा
है
मगर
चराग़
की
बैअत
से
ख़ौफ़
आता
है
Aziz Nabeel
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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आ
जाए
कौन
कब
कहाँ
कैसी
ख़बर
के
साथ
अपने
ही
घर
में
बैठा
हुआ
हूँ
मैं
डर
के
साथ
Pratap Somvanshi
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वही
दिल
है
कि
हर
इक
बात
पे
आवाज़
करता
था
वही
दिल
है
किसी
भी
बात
पे
अब
खन
नहीं
करता
वही
चेहरा
है
मैं
अक्सर
कि
जिस
की
क़स्में
खाता
था
वही
चेहरा
है
पर
अब
देखने
का
मन
नहीं
करता
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Mohit Subran
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बहुत
पहले
जो
इन
होंठों
पे
इक
मुस्कान
बसती
थी
नमी
की
शक्ल
में
अब
वो
मिरी
आँखों
में
रहती
है
Mohit Subran
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वही
कली
है
वही
फूल
है
वही
गुल
है
मगर
मैं
देखता
हूँ
बाग़बान
इक
नया
है
Mohit Subran
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गुज़ार
लेते
हैं
जैसे
भी
आप
दिन
लेकिन
ये
हम
ही
जानते
हैं
रात
कैसे
कटती
है
Mohit Subran
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तुम्हें
तो
यार
मुयस्सर
है
बस
ख़ुशी
ही
ख़ुशी
तुम्हारा
क्या
जिसे
चाहो
उसे
उदास
करो
Mohit Subran
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