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Mohit Subran
vahii dil hai ki har ik baat pe aawaaz karta tha
vahii dil hai ki har ik baat pe aawaaz karta tha | वही दिल है कि हर इक बात पे आवाज़ करता था
- Mohit Subran
वही
दिल
है
कि
हर
इक
बात
पे
आवाज़
करता
था
वही
दिल
है
किसी
भी
बात
पे
अब
खन
नहीं
करता
वही
चेहरा
है
मैं
अक्सर
कि
जिस
की
क़स्में
खाता
था
वही
चेहरा
है
पर
अब
देखने
का
मन
नहीं
करता
- Mohit Subran
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वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आ
कर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
Zubair Ali Tabish
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बात
ये
है
कि
आदमी
शाइर
या
तो
होता
है
या
नहीं
होता
Mahboob Khizan
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ये
अलग
बात
कि
ख़ामोश
खड़े
रहते
हैं
फिर
भी
जो
लोग
बड़े
हैं,
वो
बड़े
रहते
हैं
Rahat Indori
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इक
लड़की
से
बात
करो
तो
लगता
है
इस
दुनिया
को
छोड़
के
भी
इक
दुनिया
है
Shadab Asghar
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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है
कुछ
ऐसी
ही
बात
जो
चुप
हूँ
वर्ना
क्या
बात
कर
नहीं
आती
Mirza Ghalib
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कुछ
बात
है
कि
हस्ती
मिटती
नहीं
हमारी
सदियों
रहा
है
दुश्मन
दौर-ए-ज़माँ
हमारा
Allama Iqbal
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जहान
भर
में
न
हो
मुयस्सर
जो
कोई
शाना,
हमें
बताना
नहीं
मिले
गर
कोई
ठिकाना
तो
लौट
आना,
हमें
बताना
कुछ
ऐसी
बातें
जो
अनकही
हों,
मगर
वो
अंदर
से
खा
रही
हों
लगे
किसी
को
बताना
है
पर
नहीं
बताना,
हमें
बताना
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Vikram Gaur Vairagi
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सोच
समझ
कर
देख
लिया
है
क्या
बोलूँ
तुझ
को
तो
हर
बात
बुरी
लग
जाती
है
Sohil Barelvi
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मिले
तो
कुछ
बात
भी
करोगे
कि
बस
उसे
देखते
रहोगे
Shariq Kaifi
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बात
जो
फैली
थी
हू-ब-हू
ही
रही
दर-ब-दर
घर-ब-घर
कू-ब-कू
ही
रही
क़ीमती
शय
है
दिल
फिर
से
देता
किसे
तू
ही
पहले
थी
याँ
बाद
तू
ही
रही
ला
नहीं
पाया
अंजाम
तक
हिज्र
को
वस्ल
की
आरज़ू,
आरज़ू
ही
रही
खो
दिया
जान
कर
पहले
तो
एक
शख़्स
उम्र-भर
उस
की
फिर
जुस्तुजू
ही
रही
साल-दर-साल
से
घर
की
सूरत
वही
हाव-हू
रहती
थी
हाव-हू
ही
रही
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Mohit Subran
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जमी
है
गर्द
पुतली
पर
पड़े
हैं
दर्द
कोनों
में
छिपी
है
एक
मुद्दत
से
कोई
ख़ुश्की
सी
पलकों
में
हूँ
कब
से
मुन्तज़िर
बरसात
का
आशा
में
लहरों
के
कि
फूटेंगे
कभी
तो
ग़म
खिलेंगे
अश्क
दीदों
में
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Mohit Subran
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लगा
लो
अपने
कलेजे
से
तुम
इन्हें
मोहित
ये
लोग
फिर
न
तुम्हें
दस्तियाब
हों
शायद
Mohit Subran
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बची
ज़ीस्त
में
न
हो
इक़्तिज़ा
कभी
एक-दूसरे
की
हमें
तिरी
भी
गुज़र
हो
मिरे
बिना,
मिरी
भी
बसर
हो
तिरे
बिना
Mohit Subran
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रखो
उम्मीद
ज़िन्दा
साल
के
अंतिम
महीने
तक
वो
बिछड़ा
शख़्स
क्या
मालूम
मिल
जाए
दिसंबर
में
Mohit Subran
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