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Mohit Subran
nazar ko ghumaao zara aur dekho
nazar ko ghumaao zara aur dekho | नज़र को घुमाओ ज़रा और देखो
- Mohit Subran
नज़र
को
घुमाओ
ज़रा
और
देखो
कि
मौजूद
किरदार
इक-इक
यहीं
है
तुम्हारी
कहानी
हक़ीक़त
अगर
है
हमारा
भी
क़िस्सा
ख़याली
नहीं
है
- Mohit Subran
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सफ़र
के
ब'अद
भी
मुझ
को
सफ़र
में
रहना
है
नज़र
से
गिरना
भी
गोया
ख़बर
में
रहना
है
Aadil Raza Mansoori
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दिलों
की
बातें
दिलों
के
अंदर
ज़रा
सी
ज़िद
से
दबी
हुई
हैं
वो
सुनना
चाहें,
ज़ुबां
से
सब
कुछ
मैं
करना
चाहूँ
नज़र
से
बतियां
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है,
ये
इश्क़
क्या
है
सुलगती
सांसें,
तरसती
आँखें,
मचलती
रूहें,
धड़कती
छतियां
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Aalok Shrivastav
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देखो
तो
चश्म-ए-यार
की
जादू-निगाहियाँ
बेहोश
इक
नज़र
में
हुई
अंजुमन
तमाम
Hasrat Mohani
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हम
भी
ख़ुद
को
तबाह
कर
लेते
तुम
इधर
भी
निगाह
कर
लेते
Behzad Lakhnavi
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मैं
नज़र
से
पी
रहा
था
तो
ये
दिल
ने
बद-दुआ
दी
तिरा
हाथ
ज़िंदगी
भर
कभी
जाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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कभी
फूल
देखती
है
कभी
देखती
है
कलियाँ
मुझे
कर
रही
है
पागल
ये
नज़र
फिसल
फिसल
के
Ajeetendra Aazi Tamaam
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इक
तो
ये
नूर
उस
पे
मेरी
शर्म
भी
अलग
तू
सामने
रहा
तो
निगह
उठ
न
पाएगी
shaan manral
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बोसा
देते
नहीं
और
दिल
पे
है
हर
लहज़ा
निगाह
जी
में
कहते
हैं
कि
मुफ़्त
आए
तो
माल
अच्छा
है
Mirza Ghalib
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दिल्ली
के
न
थे
कूचे
औराक़-ए-मुसव्वर
थे
जो
शक्ल
नज़र
आई
तस्वीर
नज़र
आई
Meer Taqi Meer
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फैलते
ही
ज़द
में
ले
लेती
है
सब
को
आग
कब
हिन्दू-मुसलमाँ
देखती
है
Mohit Subran
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ये
जो
अवाम
है
इस
को
तू
ना-तवाँ
न
समझ
इसी
अवाम
ने
इक
सल्तनत
ढहा
डाली
Mohit Subran
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बहुत
मुश्किल
है
मैं
इस
सख़्त-हालत
से
निकल
पाऊँ
बहुत
मुमकिन
है
मैं
शायद
इसी
हालत
में
मर
जाऊँ
Mohit Subran
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ख़त्म
होने
को
सफ़र
अब
ज़िंदगी
का
लगता
है
ये
गुज़रता
लम्हा
है
जो
आख़िरी
सा
लगता
है
Mohit Subran
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करवट-करवट
बढ़ते-बढ़ते
नींद
की
सीढ़ी
चढ़ते-चढ़ते
थक
कर
आख़िर
सो
जाता
हूँ
मैं
बिस्तर
से
लड़ते-लड़ते
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Mohit Subran
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