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Mohit Subran
na koii ghar na koii shaKHs kuchh bhi to nahin bachta
na koii ghar na koii shaKHs kuchh bhi to nahin bachta | न कोई घर न कोई शख़्स कुछ भी तो नहीं बचता
- Mohit Subran
न
कोई
घर
न
कोई
शख़्स
कुछ
भी
तो
नहीं
बचता
हवा
जब
आग
भर
के
मुँह
में
बस्ती
से
गुज़रती
है
- Mohit Subran
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ख़ुद
को
खोना
रहा
है
बाक़ी
बस
बाक़ी
सब
तो
खो
ही
चुका
हूँ
मैं
Mohit Subran
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ख़ुद
को
उस
वक़्त
निखारा
होता
तो
बुलंदी
पे
सितारा
होता
रोकता
कौन
हमें
दुनिया
में
फिर
गर
उधर
से
भी
इशारा
होता
धूल
से
भर
गई
गुल्लक
वर्ना
मैं
तुझे
सब
से
पियारा
होता
जिस्म
जज़्बात
जिगर
को
मैंने
और
किसी
तन
में
उतारा
होता
यूँँ
न
उलझाता
लटें
ज़िन्दगी
की
ज़ुल्फ़
को
इस
की
सँवारा
होता
बहता
हूँ
दर्द
के
जिस
दरिया
में
कोई
तो
इसका
किनारा
होता
रास
बर्बादी
ही
आई
वर्ना
मैं
हर
इक
आँख
का
तारा
होता
लम्हा
जो
गुज़रा
दो
लम्हे
पहले
लम्हा
वो
हँस
के
गुज़ारा
होता
क्यूँ
दी
आवाज़
तुझे
डूबते
वक़्त
काश
तुझ
को
न
पुकारा
होता
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Mohit Subran
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जमी
है
गर्द
पुतली
पर
पड़े
हैं
दर्द
कोनों
में
छिपी
है
एक
मुद्दत
से
कोई
ख़ुश्की
सी
पलकों
में
हूँ
कब
से
मुन्तज़िर
बरसात
का
आशा
में
लहरों
के
कि
फूटेंगे
कभी
तो
ग़म
खिलेंगे
अश्क
दीदों
में
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Mohit Subran
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दुख
पड़ने
पर
हो
जाता
है
चुप-चाप
आदमी
जब
धूप
पड़ती
है
तो
नदी
सूख
जाती
है
Mohit Subran
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कुछ
और
देर
हवा
में
कर्तब
दिखलाएगी
और
फिर
ये
मिट्टी,
मिट्टी
में
मिल
जाएगी
Mohit Subran
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