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Mohit Subran
dukh padne par ho jaata hai chup-chaap aadmi
dukh padne par ho jaata hai chup-chaap aadmi | दुख पड़ने पर हो जाता है चुप-चाप आदमी
- Mohit Subran
दुख
पड़ने
पर
हो
जाता
है
चुप-चाप
आदमी
जब
धूप
पड़ती
है
तो
नदी
सूख
जाती
है
- Mohit Subran
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सफ़र
में
धूप
तो
होगी
जो
चल
सको
तो
चलो
सभी
हैं
भीड़
में
तुम
भी
निकल
सको
तो
चलो
Nida Fazli
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ये
कांटे,
ये
धूप,
ये
पत्थर
इनसे
कैसा
डरना
है
राहें
मुश्किल
हो
जाएँ
तो
छोड़ी
थोड़ी
जाती
हैं
Subhan Asad
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लगा
आग
पानी
को
दौड़े
है
तू
ये
गर्मी
तेरी
इस
शरारत
के
बाद
Meer Taqi Meer
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तेज़
धूप
में
आई
ऐसी
लहर
सर्दी
की
मोम
का
हर
इक
पुतला
बच
गया
पिघलने
से
Qateel Shifai
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जली
हैं
धूप
में
शक्लें
जो
माहताब
की
थीं
खिंची
हैं
काँटों
पे
जो
पत्तियाँ
गुलाब
की
थीं
Dagh Dehlvi
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ऐसी
सर्दी
है
कि
सूरज
भी
दुहाई
माँगे
जो
हो
परदेस
में
वो
किस
सेे
रज़ाई
माँगे
Rahat Indori
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धूप
पड़े
उस
पर
तो
तुम
बादल
बन
जाना
अब
वो
मिलने
आए
तो
उसको
घर
ठहराना।
तुमको
दूर
से
देखते
देखते
गुज़र
रही
है
मर
जाना
पर
किसी
गरीब
के
काम
न
आना।
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Tehzeeb Hafi
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बाद-ए-बहार
में
सब
आतिश
जुनून
की
है
हर
साल
आवती
है
गर्मी
में
फ़स्ल-ए-होली
Wali Uzlat
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वो
सर्दियों
की
धूप
की
तरह
ग़ुरूब
हो
गया
लिपट
रही
है
याद
जिस्म
से
लिहाफ़
की
तरह
Musavvir Sabzwari
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ग़ुर्बत
की
ठंडी
छाँव
में
याद
आई
उस
की
धूप
क़द्र-ए-वतन
हुई
हमें
तर्क-ए-वतन
के
बाद
Kaifi Azmi
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मौत
वो
राज़
जिस
को
जानने
को
कितने
लोगों
ने
ज़िन्दगी
लुटा
दी
Mohit Subran
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बड़े
लोगों
की
इस
सादा-लिबासी
पे
न
जाना
तुम
ये
सादा-रूप
सादा-पन
भी
इनका
एक
फ़ैशन
है
Mohit Subran
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ज़रूरत
क्या
तिजारत-गार
को
ख़ुद
हाथ
रँगने
की
ठिकाने
कुछ
लगाना
हो
अगर
सरकार
बैठी
है
Mohit Subran
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तेरा
चेहरा
देख
लिया
मैं
ने
धोका
देख
लिया
चेहरे
की
तह
में
मौजूद
इक
और
चेहरा
देख
लिया
झूट
कपट
मक्कारी
का
लम्बा
अर्सा
देख
लिया
सात
बरस
और
नौ
मह
को
कर
के
ज़ाया'
देख
लिया
क्या
रक्खा
है
पास
तिरे
ये
भी
लहजा
देख
लिया
दरिया
के
घर
में
रह
के
ख़ुद
को
प्यासा
देख
लिया
छोड़
दिया
मिलना
सब
से
ख़ाली
कमरा
देख
लिया
तन्हाई
भी
ख़ूँ
रो
दे
ऐसा
तन्हा
देख
लिया
चल
ख़ुश
रह
तेरी
ख़ातिर
तेरा
चूड़ा
देख
लिया
रोती
क्यूँ
है
तू
ने
तो
चख
के
पैसा
देख
लिया
सब
हासिल
कब
होता
है
वक़्त
का
काँटा
देख
लिया
वाक़िफ़
हूँ
हालत
से
तिरी
तुझ
को
सहता
देख
लिया
उस
ने
ऐसी
गत
की
है
फिर
भी
हँसता
देख
लिया
सह
लेती
हैं
दुख
भी
गर
हो
जो
पैसा
देख
लिया
दौलत
का
जादू-टोना
आख़िर
चलता
देख
लिया
कारण
उस
इक
शख़्स
के
हाए
हम
ने
क्या-क्या
देख
लिया
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Mohit Subran
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बिगाड़
दी
है
ये
जो
एक
ज़िन्दगी
मैं
ने
इसे
बनाने
में
दो
ज़िन्दगी
लगेंगी
मुझे
Mohit Subran
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