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Mohit Subran
jo shakhs ratte-ratte tira naam mar gaya
jo shakhs ratte-ratte tira naam mar gaya | जो शख़्स रटते-रटते तिरा नाम मर गया
- Mohit Subran
जो
शख़्स
रटते-रटते
तिरा
नाम
मर
गया
ऐ
शाहज़ादी
उस
का
तुझे
नाम
याद
है
- Mohit Subran
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मैं
रहा
उम्र
भर
जुदा
ख़ुद
से
याद
मैं
ख़ुद
को
उम्र
भर
आया
Jaun Elia
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याद
उसे
भी
एक
अधूरा
अफ़्साना
तो
होगा
कल
रस्ते
में
उस
ने
हम
को
पहचाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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ज़रा
सी
देर
आँखों
में
चली
जाए
तुम्हारी
याद
बहुत
दिन
हो
गए
दिल
का
मुझे
झाड़ू
लगाना
है
Tanoj Dadhich
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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वर्षों
की
सब
याद
सजा
के
रक्खी
है
घर
में
बस
सामान
नहीं
है,
समझा
कर
Shivam Tiwari
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ज़रा
देर
बैठे
थे
तन्हाई
में
तिरी
याद
आँखें
दुखाने
लगी
Adil Mansuri
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'अंजुम'
तुम्हारा
शहर
जिधर
है
उसी
तरफ़
इक
रेल
जा
रही
थी
कि
तुम
याद
आ
गए
Anjum Rehbar
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यहाँ
पे
कल
की
रात
सर्द
थी
हर
एक
रोज़
से
सो
रात
भर
बुझा
नहीं
तुम्हारी
याद
का
अलाव
Siddharth Saaz
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इस
तरह
रोते
हैं
हम
याद
तुझे
करते
हुए
जैसे
तू
होता
तो
सीने
से
लगा
लेता
हमें
Vikram Gaur Vairagi
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मिला
जो
दर्द
यहाँ
से
वहाँ
से
सब
मैं
ने
लिखी
ग़ज़ल
उसी
के
सीने
में
उतार
दिया
Mohit Subran
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मोहज़्ज़ब
लहजे
की
'मोहित'
वहाँ
उम्मीद
क्या
करना
जहाँ
हर
शख़्स
के
होंठों
से
पैहम
गाली
झड़ती
हों
Mohit Subran
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बात
जो
फैली
थी
हू-ब-हू
ही
रही
दर-ब-दर
घर-ब-घर
कू-ब-कू
ही
रही
क़ीमती
शय
है
दिल
फिर
से
देता
किसे
तू
ही
पहले
थी
याँ
बाद
तू
ही
रही
ला
नहीं
पाया
अंजाम
तक
हिज्र
को
वस्ल
की
आरज़ू,
आरज़ू
ही
रही
खो
दिया
जान
कर
पहले
तो
एक
शख़्स
उम्र-भर
उस
की
फिर
जुस्तुजू
ही
रही
साल-दर-साल
से
घर
की
सूरत
वही
हाव-हू
रहती
थी
हाव-हू
ही
रही
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Mohit Subran
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हौले-हौले
गुज़र
रहा
हूँ
मैं
वक़्त
से
पहले
मर
रहा
हूँ
मैं
ज़िन्दगी
बस
बसर
की
हो
जिसने
एक
ऐसा
बशर
रहा
हूँ
मैं
फिर
वो
कोई
भी
शख़्स
क्यूँ
न
सही
हर
किसी
को
अखर
रहा
हूँ
मैं
जाने
क्या
सूझी
है
जो
शिद्दत
से
ख़ुद
को
बर्बाद
कर
रहा
हूँ
हाए
ये
सच
वहाँ
तबाही
रही
आज
तक
भी
जिधर
रहा
हूँ
मैं
न
गिनूँ
इस
जहान
को
फिर
तो
हर
जगह
कार-गर
रहा
हूँ
मैं
आख़िरश
क्या
है
वो
जो
खोया
नहीं
फिर
ये
किस
डर
से
डर
रहा
हूँ
मैं
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Mohit Subran
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दिल
में
रह-रह
के
है
उठता
एक
दिन
ऐसा
करूँँ
मैं
ले
के
ख़ुशियों
का
हथौड़ा
ग़म
की
छाती
तोड़
दूँ
मैं
Mohit Subran
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