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Mohit Subran
dosti par kya kahooñ itnaa kahunga main faqat
dosti par kya kahooñ itnaa kahunga main faqat | दोस्ती पर क्या कहूँ इतना कहूँगा मैं फ़क़त
- Mohit Subran
दोस्ती
पर
क्या
कहूँ
इतना
कहूँगा
मैं
फ़क़त
राब्ता
कोई
हो
ग़ुर्बत
में
नहीं
टिकता
मगर
- Mohit Subran
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है
अब
भी
बिस्तर-ए-जाँ
पर
तिरे
बदन
की
शिकन
मैं
ख़ुद
ही
मिटने
लगा
हूँ
उसे
मिटाते
हुए
Azhar Iqbal
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अगर
मैं
कथा
का
क़लमकार
होता
यक़ीनन
ही
वो
तो
मिरा
यार
होता
लगाती
नहीं
हर
दफ़ा
वो
बहाने
लगा
लेती
सीने
से
गर
प्यार
होता
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Vijay Potter Singhadiya
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कुछ
एक
की
हम
जैसी
क़िस्मत
होती
है
बाकी
सब
की
अच्छी
क़िस्मत
होती
है
Bhaskar Shukla
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मैं
सात
साल
से
अब
तक
हिसार-ए-इश्क़
में
हूँ
वो
शख़्स
आज
भी
मेरे
दिल-ओ-दिमाग़
में
है
Amaan Haider
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फिजूलखर्ची
नहीं
करेंगे
हमारे
चंद
अच्छे
दोस्तों
ने
ये
वा'दा
ख़ुद
से
किया
हुआ
है
कि
शक्ल
अल्लाह
ने
अच्छी
दी
है
सो
बातें
अच्छी
नहीं
करेंगे
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Rehman Faris
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तुम्हारी
राह
में
मिट्टी
के
घर
नहीं
आते
इसलिए
तो
तुम्हें
हम
नज़र
नहीं
आते
Waseem Barelvi
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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चारा-गर
तो
तभी
बचा
पाएँगे
ना
चारा-गर
की
जान
बचाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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ऐ
मुझ
को
फ़रेब
देने
वाले
मैं
तुझ
पे
यक़ीन
कर
चुका
हूँ
Athar Nafees
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ये
ऐसा
क़र्ज़
है
जो
मैं
अदा
कर
ही
नहीं
सकता
मैं
जब
तक
घर
न
लौटूँ
मेरी
माँ
सज्दे
में
रहती
है
Munawwar Rana
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बची
है
ज़िन्दगी
में
जो
भी
रौशनी
उस
पे
गड़ाए
बैठी
है
नज़रों
को
तीरगी
अपनी
Mohit Subran
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अगर
चुनना
पड़े
तुझ
में
या
दुश्मन
में
मैं
आँखें
बंद
कर
दुश्मन
चुनूँगा
दोस्त
Mohit Subran
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न
जाने
कब
भला
मुझ
पे
गिरेगी
बर्क़
आकर
न
जाने
कब
भला
छूटूँगा
इस
ज़िंदान
से
मैं
न
जाने
कब
भला
टूटेगी
सर
पे
कोई
आफ़त
न
जाने
कब
भला
जाऊँगा
आख़िर
जान
से
मैं
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Mohit Subran
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देखे
हैं
तेरे
जल्वे
भी
लेकिन
हम
तेरी
सादगी
पे
मरते
हैं
Mohit Subran
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हाँ
मेरे
साथ
कई
नफ़्सियाती
मसअले
हैं
तमाम
ज़हनी
मसाइल
से
जूझता
हूँ
मैं
ये
ज़ेहन
मेरा
न
मुझ
को
कहीं
निगल
बैठे
मुझे
बचाओ
रफ़ीक़ो
कि
डूबता
हूँ
मैं
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Mohit Subran
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