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Mohit Subran
na jaane kab bhala mujh pe giregi barq aakarna jaane kab bhala chhootoonga is zindaan se main
na jaane kab bhala mujh pe giregi barq aakarna jaane kab bhala chhootoonga is zindaan se main | न जाने कब भला मुझ पे गिरेगी बर्क़ आकर
- Mohit Subran
न
जाने
कब
भला
मुझ
पे
गिरेगी
बर्क़
आकर
न
जाने
कब
भला
छूटूँगा
इस
ज़िंदान
से
मैं
न
जाने
कब
भला
टूटेगी
सर
पे
कोई
आफ़त
न
जाने
कब
भला
जाऊँगा
आख़िर
जान
से
मैं
- Mohit Subran
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बिजली
इक
कौंध
गई
आँखों
के
आगे
तो
क्या
बात
करते
कि
मैं
लब
तश्न-ए-तक़रीर
भी
था
Mirza Ghalib
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किसी
की
बर्क़-ए-नज़र
से
न
बिजलियों
से
जले
कुछ
इस
तरह
की
हो
ता'मीर
आशियाने
की
Anwar Taban
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कभी
कभी
वो
बातें
करता
है
मुझ
सेे
गाँव
में
बिजली
हर
दिन
थोड़े
आती
है
Tanoj Dadhich
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हज़ार
बर्क़
गिरे
लाख
आँधियाँ
उट्ठें
वो
फूल
खिल
के
रहेंगे
जो
खिलने
वाले
हैं
Sahir Ludhianvi
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तूफ़ान
की
उम्मीद
थी
आँधी
नहीं
आई
वो
आप
तो
क्या
उस
की
ख़बर
भी
नहीं
आई
शायद
वो
मोहब्बत
के
लिए
ठीक
नहीं
था
शायद
ये
अँगूठी
उसे
पूरी
नहीं
आई
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Khurram Afaq
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लिपट
जाते
हैं
वो
बिजली
के
डर
से
इलाही
ये
घटा
दो
दिन
तो
बरसे
Dagh Dehlvi
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पूछा
जो
उन
सेे
चाँद
निकलता
है
किस
तरह
ज़ुल्फ़ों
को
रुख़
पे
डाल
के
झटका
दिया
कि
यूँँ
Arzoo Lakhnavi
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उम्र
गुज़री
है
माँजते
ख़ुद
को
साफ़
हैं
पर
चमक
नहीं
पाए
डाल
ने
फूल
की
तरह
पाला
ख़ार
थे
ना
महक
नहीं
पाए
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Vishal Bagh
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शाख़ों
से
टूट
जाएँ
वो
पत्ते
नहीं
हैं
हम
आँधी
से
कोई
कह
दे
कि
औक़ात
में
रहे
Rahat Indori
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ये
लाल
शा
में
ये
लाल
अंबर
ये
लाल
सूरज
चमक
रहा
है
मुझे
बता
दो
कहाँ
है
खोई
तिरे
लबों
की
ये
सुर्ख़
लाली
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Anmol Mishra
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जब
कि
तय
है
कि
सब
फिसलना
है
फिर
भला
क्यूँ
ये
जोड़-जाड़
करूँँ
Mohit Subran
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वही
कली
है
वही
फूल
है
वही
गुल
है
मगर
मैं
देखता
हूँ
बाग़बान
इक
नया
है
Mohit Subran
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गुज़ार
लेते
हैं
जैसे
भी
आप
दिन
लेकिन
ये
हम
ही
जानते
हैं
रात
कैसे
कटती
है
Mohit Subran
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बची
ज़ीस्त
में
न
हो
इक़्तिज़ा
कभी
एक-दूसरे
की
हमें
तिरी
भी
गुज़र
हो
मिरे
बिना,
मिरी
भी
बसर
हो
तिरे
बिना
Mohit Subran
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किस
को
हैं
फ़ुर्सतें
कि
किसी
की
ख़ुशी
चुभे
सब
अपने-अपने
दुख
में
ही
मसरूफ़
हैं
यहाँ
Mohit Subran
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