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Mohit Subran
ai mirii maut mujhe tujh pe taras aa raha hai
ai mirii maut mujhe tujh pe taras aa raha hai | ऐ मिरी मौत मुझे तुझ पे तरस आ रहा है
- Mohit Subran
ऐ
मिरी
मौत
मुझे
तुझ
पे
तरस
आ
रहा
है
ले
मैं
ये
ज़ीस्त
तिरे
नाम
किए
देता
हूँ
- Mohit Subran
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अचानक
छूट
जाती
है
रियासत
अचानक
मौत
आती
है
सभी
को
Meem Alif Shaz
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अपनी
नज़रों
में
गिर
चुका
हूँ
मैं
ये
तरीक़ा
भी
ख़ुद-कुशी
का
था
Bhavesh Pathak
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देखो
मौत
का
मौसम
आने
वाला
है
ज़िंदा
रहना
सब
सेे
बड़ी
लड़ाई
है
Shadab Asghar
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आई
होगी
किसी
को
हिज्र
में
मौत
मुझ
को
तो
नींद
भी
नहीं
आती
Akbar Allahabadi
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ज़िंदगी
फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता
को
पा
सकती
नहीं
मौत
ही
आती
है
ये
मंज़िल
दिखाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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मौत
का
भी
इलाज
हो
शायद
ज़िंदगी
का
कोई
इलाज
नहीं
Firaq Gorakhpuri
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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ये
भी
अच्छा
हुआ
मौत
ने
आकर
हमको
बचा
लिया
वरना
हालत
ऐसी
थी,
हम
शायर
भी
हो
सकते
थे
Bhaskar Shukla
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हमारी
मौत
पर
बेशक़
ज़माना
आएगा
रोने
मगर
ज़िंदा
हैं
जब
तक
चैन
से
जीने
नहीं
देगा
Astitwa Ankur
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उदासी
का
सबब
उस
सेे
जो
हम
तब
पूछ
लेते
वजह
फिर
पूछनी
पड़ती
न
शायद
ख़ुद-कुशी
की
Dipendra Singh 'Raaz'
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ढूँडता
था
जिसे
अच्छाइयों
में
ग़ैरों
की
देखता
हूँ
वो
बुराई
मिरे
ही
दिल
में
है
Mohit Subran
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बिगाड़
दी
है
ये
जो
एक
ज़िन्दगी
मैं
ने
इसे
बनाने
में
दो
ज़िन्दगी
लगेंगी
मुझे
Mohit Subran
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हौले-हौले
गुज़र
रहा
हूँ
मैं
वक़्त
से
पहले
मर
रहा
हूँ
मैं
ज़िन्दगी
बस
बसर
की
हो
जिसने
एक
ऐसा
बशर
रहा
हूँ
मैं
फिर
वो
कोई
भी
शख़्स
क्यूँ
न
सही
हर
किसी
को
अखर
रहा
हूँ
मैं
जाने
क्या
सूझी
है
जो
शिद्दत
से
ख़ुद
को
बर्बाद
कर
रहा
हूँ
हाए
ये
सच
वहाँ
तबाही
रही
आज
तक
भी
जिधर
रहा
हूँ
मैं
न
गिनूँ
इस
जहान
को
फिर
तो
हर
जगह
कार-गर
रहा
हूँ
मैं
आख़िरश
क्या
है
वो
जो
खोया
नहीं
फिर
ये
किस
डर
से
डर
रहा
हूँ
मैं
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Mohit Subran
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बात
जब
हक़
की
हो
इक
शख़्स
नहीं
आता
है
बात
मज़हब
की
हो
तो
भीड़
निकल
आती
है
Mohit Subran
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झुका
के
सर
अदब
से
सुन
रहा
हूँ
इन
की
बक-बक
उठा
के
सर
कि
अब
बतला
ही
दूँ
क्या
कौन
हूँ
मैं
Mohit Subran
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