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Manoj Devdutt
jab KHuda hi nahin de paaya phir
jab KHuda hi nahin de paaya phir | जब ख़ुदा ही नहीं दे पाया फिर
- Manoj Devdutt
जब
ख़ुदा
ही
नहीं
दे
पाया
फिर
आदमों
से
गिला
क्या
करते
हम
- Manoj Devdutt
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ये
हक़ीक़त
है,
मज़हका
नहीं
है
वो
बहुत
दूर
है,
जुदा
नहीं
है
तेरे
होंटों
पे
रक़्स
करता
है
राज़
जो
अब
तलक
खुला
नहीं
है
जान
ए
जांँ
तेरे
हुस्न
के
आगे
ये
जो
शीशा
है,
आइना
नहीं
है
क्यूँ
शराबोर
हो
पसीने
में
मैं
ने
बोसा
अभी
लिया
नहीं
है
उस
का
पिंदार
भी
वहीं
का
वहीं
मेरे
लब
पर
भी
इल्तेजा
नहीं
है
जो
भी
होना
था
हो
चुका
काज़िम
अब
किसी
से
हमें
गिला
नहीं
है
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Kazim Rizvi
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फिर
वही
रोना
मुहब्बत
में
गिला
शिकवा
जहाँ
से
रस्म
है
बस
इसलिए
भी
तुम
को
साल-ए-नौ
मुबारक
Neeraj Neer
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वो
जिस
घमंड
से
बिछड़ा
गिला
तो
इस
का
है
कि
सारी
बात
मोहब्बत
में
रख-रखाव
की
थी
Ahmad Faraz
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गिला
नहीं
कि
मेरे
हाल
पर
हँसी
दुनिया
गिला
तो
ये
है
कि
पहली
हँसी
तुम्हारी
थी
Subhan Asad
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ज़िन्दगी
से
यही
गिला
है
मुझे
तू
बहुत
देर
से
मिला
है
मुझे
Ahmad Faraz
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काँटे
तो
ख़ैर
काँटे
हैं
इस
का
गिला
ही
क्या
फूलों
की
वारदात
से
घबरा
के
पी
गया
Saghar Siddiqui
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ग़म-ए-फ़ुर्क़त
का
शिकवा
करने
वाली
मेरी
मौजूदगी
में
सो
रही
है
Jaun Elia
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दिल
की
तकलीफ़
कम
नहीं
करते
अब
कोई
शिकवा
हम
नहीं
करते
Jaun Elia
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वैसे
एक
शिकवा
था
तुम
सेे
अच्छा
छोडो
ईद
मुबारक
Zubair Ali Tabish
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अब
साथ
नहीं
है
भी
तो
शिकवा
नहीं
'अख़्तर'
एहसान
भी
मुझ
पर
मिरे
भाई
के
बहुत
थे
Majeed Akhtar
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अब
लोग
जो
मौन
रहते
हैं
आदम
यहाँ
कौन
रहते
हैं
टूटे
दिलों
में
हमेशा
से
इक
शख़्स
बस
जौन
रहते
हैं
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Manoj Devdutt
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बे-वजह
तुम
मुस्कुराते
रहो
एक
उत्सव
बस
मनाते
रहो
वो
उजाड़ें
नफ़रतों
से
जहाँ
तुम
मोहब्बत
से
सजाते
रहो
सुख
निभाओ
मत
निभाओ
कभी
दुख
मुकम्मल
तुम
निभाते
रहो
फूल
मुरझाते
रहेंगे
यहाँ
गुल
नए
पर
तुम
लगाते
रहो
हो
नहीं
सकता
किसी
और
का
हक़
तुम्हीं
मुझपर
जताते
रहो
बोली
प्यारी
है
तुम्हारी
हमें
गालियाँ
ही
तुम
सुनाते
रहो
दिल
दिया
तुमको
बड़े
प्यार
से
चाहो
तो
तुम
दिल
दुखाते
रहो
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Manoj Devdutt
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हद
दर्द
की
सब
पार
होने
लगी
माँ
जब
कभी
बीमार
होने
लगी
मुझपर
हुकूमत
तो
किसी
की
नहीं
पर
माँ
मेरी
सरकार
होने
लगी
मुझ
सेे
भले
सब
छीन
ले
ओ
ख़ुदा
बस
माँ
मेरी
दरकार
होने
लगी
अब
अर्थ
माँ
का
ही
मोहब्बत
बना
माँ
मेरा
पहला
प्यार
होने
लगी
चारागरी
मुझपर
हुई
फ़ेल
जब
फिर
माँ
दवा
हरबार
होने
लगी
हर
बार
मुझको
माँ
सुकूँ
देती
रही
बस
माँ
मेरा
इतवार
होने
लगी
जब
मुश्किलों
में
फँस
गया
था
'मनोज'
माँ
मेरी
फिर
पतवार
होने
लगी
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Manoj Devdutt
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जब
उठा
के
वो
नज़र
देखेंगे
क्या
पता
फिर
किस
क़दर
देखेंगे
आशिक़ी
तो
बेख़बर
होती
है
होके
हम
भी
बेख़बर
देखेंगे
काम
जब
कोई
दवाई
न
करे
फिर
दु'आ
का
हम
असर
देखेंगे
चाँद
इतनी
पास
से
कब
देखा
पर
कभी
तेरी
कमर
देखेंगे
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Manoj Devdutt
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इतने
चक्कर
काटे
हैं
तेरे
घर
के
रस्ते
के
हर
गड्ढे
से
वाक़िफ़
हूँ
मैं
Manoj Devdutt
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