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Manoj Devdutt
ab log jo maun rahte hain
ab log jo maun rahte hain | अब लोग जो मौन रहते हैं
- Manoj Devdutt
अब
लोग
जो
मौन
रहते
हैं
आदम
यहाँ
कौन
रहते
हैं
टूटे
दिलों
में
हमेशा
से
इक
शख़्स
बस
जौन
रहते
हैं
- Manoj Devdutt
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क्या
ख़ूब
तुम
ने
ग़ैर
को
बोसा
नहीं
दिया
बस
चुप
रहो
हमारे
भी
मुँह
में
ज़बान
है
Mirza Ghalib
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ख़मोशी
तो
यही
बतला
रही
है
उदासी
रास
मुझको
आ
रही
है
मुझे
जिन
ग़लतियों
से
सीखना
था
वही
फिर
ज़िंदगी
दोहरा
रही
है
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Vishal Singh Tabish
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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उम्र
भर
मेरी
उदासी
के
लिए
काफ़ी
है
जो
सबब
मेरी
ख़मोशी
के
लिए
काफ़ी
है
जान
दे
देंगे
अगर
आप
कहेंगे
हम
सेे
जान
देना
ही
मु'आफ़ी
के
लिए
काफ़ी
है
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Aakash Giri
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मेरे
होंटों
पे
ख़ामुशी
है
बहुत
इन
गुलाबों
पे
तितलियाँ
रख
दे
Shakeel Azmi
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तनक़ीद
न
तक़रार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
हैरत
है
मेरे
यार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
गूँगों
को
तकल्लुक़
के
मवाक़े
हैं
मुयस्सर
हम
माहिर-ए-गुफ़्तार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
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Ahmad Abdullah
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क़स
में,
वादे,
दरवाज़े
तो
ठीक
हैं
पर
ख़ामोशी
को
तोड़
नहीं
सकता
हूँ
मैं
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Tanoj Dadhich
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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इज़हार
पे
भारी
है
ख़मोशी
का
तकल्लुम
हर्फ़ों
की
ज़बाँ
और
है
आँखों
की
ज़बाँ
और
Haneef akhgar
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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अब
तारे
दोस्त
हैं
उसके
ही
फिर
सारे
दोस्त
हैं
उसके
ही
उस
सेे
ग़ुस्सा
कब
होते
हैं
बे-चारे
दोस्त
हैं
उसके
ही
कितनी
मीठी
है
वो
फिर
भी
सब
खारे
दोस्त
हैं
उसके
ही
सबके
हिस्सों
का
जीती
है
सब
हारे
दोस्त
हैं
उसके
ही
कितनी
गोरी
है
वो
फिर
भी
सब
कारे
दोस्त
हैं
उसके
ही
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Manoj Devdutt
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मेरे
सूखे
होंठों
पर
लब
जब
नम
वो
रखेगा
फिर
जलते
ही
अंगारों
पर
शबनम
वो
रखेगा
Manoj Devdutt
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फिर
मार
देती
तीर
मुझको
करना
था
जब
नकीर
मुझको
माँ
बाप
साथ
रह
रहे
हैं
फिर
रहने
दो
फ़क़ीर
मुझको
सब
एक
हों
जहाँ
में
ऐसी
है
खींचनी
लकीर
मुझको
पीतल
सही
बना
रहूँ
बस
होना
नहीं
नज़ीर
मुझको
इंसान
ही
बना
रहूँ
अब
होना
नहीं
कबीर
मुझको
सब
काम
हों
मनोज
के
बस
होना
नहीं
वज़ीर
मुझको
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Manoj Devdutt
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मोहब्बत
में
मुसलसल
ग़म
मिलेंगे
नहीं
जब
भी
मुकम्मल
हम
मिलेंगे
हमारे
बीच
में
है
अब
बहुत
शहर
वजह
ये
है
कि
अब
हम
कम
मिलेंगे
ख़ुशी
होगी
हमें
मिलते
हुए
पर
ये
सच
है
आँख
लेकर
नम
मिलेंगे
बिछड़कर
जा
रही
हो
मुझ
सेे
जो
तुम
कि
रम
में
डूबे
बस
फिर
हम
मिलेंगे
नहीं
मिलती
मोहब्बत
अब
जिन्हें
वो
मेरे
जैसे
ही
तो
अरकम
मिलेंगे
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Manoj Devdutt
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जब
उठाकर
वो
नज़र
देखेंगे
फिर
नज़र
से
क़त्ल
कर
देखेंगे
आशिक़ी
तो
बेख़बर
होती
है
हो
के
हम
भी
बेख़बर
देखेंगे
अब
दवाई
ही
न
करती
है
काम
अब
दु'आ
का
हम
असर
देखेंगे
चाँद
इतनी
पास
से
कब
देखा
पर
कभी
तेरी
कमर
देखेंगे
देख
लेंगे
हम
तुम्हें
पूरा
पर
हर
दफ़ा
पर
मुख़्तसर
देखेंगे
इक
गली
मंज़िल
रहेगी
अब
से
तेरी
खिड़की
और
दर
देखेंगे
घर
से
निकले
हो
गया
इक
अर्सा
घूमकर
हम
दर-ब-दर
देखेंगे
ख़ुद
ख़ुदा
देंगे
तुम्हें
मनचाहा
कर्म
का
पहले
शजर
देखेंगे
देखना
है
जो
मना
हम
सबको
काम
करके
वो
मगर
देखेंगे
है
मना
ये
अब
मुझे
पर
हम
तो
अपना
तुझ
में
हम-सफ़र
देखेंगे
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