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Manoj Devdutt
jab utha ke vo nazar dekhenge
jab utha ke vo nazar dekhenge | जब उठा के वो नज़र देखेंगे
- Manoj Devdutt
जब
उठा
के
वो
नज़र
देखेंगे
क्या
पता
फिर
किस
क़दर
देखेंगे
आशिक़ी
तो
बेख़बर
होती
है
होके
हम
भी
बेख़बर
देखेंगे
काम
जब
कोई
दवाई
न
करे
फिर
दु'आ
का
हम
असर
देखेंगे
चाँद
इतनी
पास
से
कब
देखा
पर
कभी
तेरी
कमर
देखेंगे
- Manoj Devdutt
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मेरे
जिस्म
से
वक़्त
ने
कपड़े
नोच
लिए
मंज़र
मंज़र
ख़ुद
मेरी
पोशाक
हुआ
Azm Shakri
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हवा
चली
तो
उसकी
शॉल
मेरी
छत
पे
आ
गिरी
ये
उस
बदन
के
साथ
मेरा
पहला
राब्ता
हुआ
Zia Mazkoor
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किसी
कली
किसी
गुल
में
किसी
चमन
में
नहीं
वो
रंग
है
ही
नहीं
जो
तिरे
बदन
में
नहीं
Farhat Ehsaas
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गूँजता
है
बदन
में
सन्नाटा
कोई
ख़ाली
मकान
हो
जैसे
Aanis Moin
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गुजर
चुकी
जुल्मते
शब-ए-हिज्र,
पर
बदन
में
वो
तीरगी
है
मैं
जल
मरुंगा
मगर
चिरागों
के
लो
को
मध्यम
नहीं
करूँगा
यह
अहद
लेकर
ही
तुझ
को
सौंपी
थी
मैंने
कलबौ
नजर
की
सरहद
जो
तेरे
हाथों
से
कत्ल
होगा
मैं
उस
का
मातम
नहीं
करूँगा
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Tehzeeb Hafi
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टूटा
तो
हूँ
मगर
अभी
बिखरा
नहीं
'फ़राज़'
मेरे
बदन
पे
जैसे
शिकस्तों
का
जाल
हो
Ahmad Faraz
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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हमारे
बाद
तेरे
इश्क़
में
नए
लड़के
बदन
तो
चू
मेंगे
ज़ुल्फ़ें
नहीं
सँवारेंगे
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Vikram Gaur Vairagi
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ख़ुद
हुस्न
से
न
पूछिए
ता'रीफ़
हुस्न
की
दीवाने
से
ये
पूछिए
दीवाना
क्यूँँ
हुआ
Ameer Imam
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बदन
के
दोनों
किनारों
से
जल
रहा
हूँ
मैं
कि
छू
रहा
हूँ
तुझे
और
पिघल
रहा
हूँ
मैं
Irfan Siddiqi
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ग़लती
सब
अपनी
बतानी
पड़
गई
तेरी
इज़्ज़त
यूँँ
बचानी
पड़
गई
हो
रहा
है
ये
अज़ल
से
हर
दफ़ा
आशिक़ों
की
कम
जवानी
पड़
गई
यूँँ
निभाना
पड़
गया
वा'दा
हमें
अपनी
चाहत
ही
गँवानी
पड़
गई
तेरी
हसरत
करनी
थी
पूरी
मुझे
हसरतें
अपनी
दबानी
पड़
गई
बात
तेरी
जो
ग़लत
थी
ख़ुद
मुझे
महफ़िलों
में
वो
दबानी
पड़
गई
जीतकर
हारा
हुआ
हूँ
मैं
उसे
जात
से
बस
मात
खानी
पड़
गई
तू
मिलेगी
ही
नहीं
बस
'देव'
को
रूह
अंदर
से
हटानी
पड़
गई
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Manoj Devdutt
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गुलाबी
होंठ
काले
हो
गए
उसके
वो
अब
सिगरेट
भी
पीने
लगी
है
क्या
Manoj Devdutt
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ग़लत
थी
बात
जो
कह
दी
गई
है
ग़लत
इंसान
को
शह
दी
गई
है
Manoj Devdutt
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वो
कहते
हैं
पैसा
कुछ
भी
नहीं
मैं
कहता
हूँ
ऐसा
कुछ
भी
नहीं
तुम
बन
जाती
हो
रानी
जैसी
मुझ
में
राजा
जैसा
कुछ
भी
नहीं
जब
मैं
पूछूँ
क्या
है
हमारे
बीच
तो
कहती
है
वैसा
कुछ
भी
नहीं
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Manoj Devdutt
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भूल
जाना
बेहतर
ही
है
याद
ऐसे
रखने
से
तो
Manoj Devdutt
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