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Manoj Devdutt
ham mubtala-e-gham kabhi honge nahin
ham mubtala-e-gham kabhi honge nahin | हम मुब्तला-ए-ग़म कभी होंगे नहीं
- Manoj Devdutt
हम
मुब्तला-ए-ग़म
कभी
होंगे
नहीं
होगा
दुखी
दुख
हम
दुखी
होंगे
नहीं
- Manoj Devdutt
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सारे
दुख
सो
जाएँगे
लेकिन
इक
ऐसा
ग़म
भी
है
जो
मिरे
बिस्तर
पे
सदियों
का
सफ़र
रख
जाएगा
Azm Shakri
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आह
को
चाहिए
इक
उम्र
असर
होने
तक
कौन
जीता
है
तिरी
ज़ुल्फ़
के
सर
होने
तक
Mirza Ghalib
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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इस
क़दर
जज़्ब
हो
गए
दोनों
दर्द
खेंचूँ
तो
दिल
निकल
आए
Abbas Qamar
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ये
मयख़ाने
में
बैठ
अफ़सोस
अब
क्यूँ
तेरे
हिस्से
भी
तो
जवानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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किस
ने
हमारे
शहर
पे
मारी
है
रौशनी
हर
इक
मकाँ
के
ज़ख़्म
से
जारी
है
रौशनी
Nomaan Shauque
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जिसकी
ख़ातिर
कितनी
रातें
सुलगाई
जिसके
दुख
में
दिल
जाने
क्यूँ
रोता
है
इक
दिन
हम
सेे
पूछ
रही
थी
वो
लड़की
प्यार
में
कोई
पागल
कैसे
होता
है
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Ritesh Rajwada
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यूँँ
दिल
को
तड़पने
का
कुछ
तो
है
सबब
आख़िर
या
दर्द
ने
करवट
ली
या
तुम
ने
इधर
देखा
Jigar Moradabadi
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ज़ख़्म
दिल
पर
हज़ार
करता
है
और
कहता
है
प्यार
करता
है
दर्द
दिल
में
उतर
गया
कैसे
कोई
अपना
ही
वार
करता
है
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Santosh S Singh
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कितना
भी
दर्द
पिला
दे
ख़ुदा
पी
सकता
हूँ
ज़िन्दगी
हिज्र
से
भर
दे
मिरी
जी
सकता
हूँ
हर
दफ़ा
दिल
पे
ही
खा
के
हुई
है
आदत
ये
बंद
आँखों
से
भी
हर
ज़ख़्म
को
सी
सकता
हूँ
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Faiz Ahmad
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ये
हाथ
उसके
हाथ
में
होते
हम
कब
धुएँ
के
साथ
में
होते
Manoj Devdutt
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सच
जब
कड़वा
होता
है
तो
फिर
कड़वा
ही
लगेगा
झूठ
छलावा
अच्छा
होता
है
अच्छा
ही
लगेगा
Manoj Devdutt
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इक
ग़लती
अब
दो
बार
मैं
करता
नहीं
बस
इसलिए
भी
प्यार
मैं
करता
नहीं
हैं
लोग
करते
पीठ
पर
ही
बार
अब
पर
पीठ
पर
ही
वार
मैं
करता
नहीं
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Manoj Devdutt
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दीया
बुझने
से
बचाता
रहा
हाथ
अपना
मैं
जलाता
रहा
छोड़कर
मजबूरियों
में
गई
मैं
यही
ख़ुद
को
बताता
रहा
जो
मुझे
अपना
समझते
नहीं
हक़
उन्हीं
पर
मैं
जताता
रहा
ऐब
मेरे
जो
गिनाते
रहे
आइने
उनको
दिखाता
रहा
रूठकर
मुझ
सेे
गया
एक
शख़्स
उम्र
भर
उसको
मनाता
रहा
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Manoj Devdutt
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क़र्ज़
उनका
हम
चुकाएँ
कैसे
फ़र्ज़
अपना
हम
निभाएँ
कैसे
पिंजरा
अब
हम
खोल
तो
देंगे
पर
उड़ना
पंछी
को
सिखाएँ
कैसे
साख़
काटी
जिस
शजर
की
तुमने
फूल
उसके
मुस्कुराएँ
कैसे
वस्ल
के
ही
ज़ख़्म
अब
दुखते
हैं
ज़ख़्म
ये
फिर
हम
दिखाएँ
कैसे
भीड़
ने
नंगा
किया
औरत
को
गर्व
से
सर
हम
उठाएँ
कैसे
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Manoj Devdutt
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