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Kumar Aryan
ye dard bhi wafaon men dhona pada mujhe
ye dard bhi wafaon men dhona pada mujhe | ये दर्द भी वफ़ाओं में ढ़ोना पड़ा मुझे
- Kumar Aryan
ये
दर्द
भी
वफ़ाओं
में
ढ़ोना
पड़ा
मुझे
तेरे
सिवा
भी
और
का
होना
पड़ा
मुझे
महफ़िल
भी
ख़ुशगवार
थी
औ
ख़ुश
थे
लोग
भी
फिर
याद
तेरी
आ
गई
रोना
पड़ा
मुझे
इक
सिम्त
मुफ़लिसी
थी
तो
इक
सिम्त
फ़र्ज़
था
ख़ुशियों
के
साथ
ग़म
को
भी
ढ़ोना
पड़ा
मुझे
तन्हाईयाँ
बहुत
मिली
रुसवाईयाँ
भी
ख़ूब
बहरे
अलम
में
ख़ुद
को
डुबोना
पड़ा
मुझे
- Kumar Aryan
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उस
ने
वा'दा
किया
है
आने
का
रंग
देखो
ग़रीब
ख़ाने
का
Josh Malihabadi
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पहला
इश्क़
सफल
हो
जाए
यार
कहाँ
ये
मुमकिन
है
पहली
रोटी
गोल
बने
ये
तो
लगभग
नामुमकिन
है
Rituraj kumar
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तुम
भी
रोती
हुई
दिखाई
दो
मैंने
रोते
हुए
ये
चाहा
था
Vikas Rana
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ये
टूटी
चटाई
ये
मिटटी
का
बर्तन
हिकारत
से
नादान
क्या
देखता
है
गरीबी
मोहम्मद
के
घर
में
पली
है
मेरे
घर
का
सामान
क्या
देखता
है
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Anjuman rahi raza
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सुनते
हैं
इश्क़
नाम
के
गुज़रे
हैं
इक
बुज़ुर्ग
हम
लोग
भी
फ़क़ीर
इसी
सिलसिले
के
हैं
Firaq Gorakhpuri
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हज़ारों
साल
नर्गिस
अपनी
बे-नूरी
पे
रोती
है
बड़ी
मुश्किल
से
होता
है
चमन
में
दीदा-वर
पैदा
Allama Iqbal
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शराब
खींची
है
सब
ने
ग़रीब
के
ख़ूँ
से
तू
अब
अमीर
के
ख़ूँ
से
शराब
पैदा
कर
तू
इंक़लाब
की
आमद
का
इंतिज़ार
न
कर
जो
हो
सके
तो
अभी
इंक़लाब
पैदा
कर
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Asrar Ul Haq Majaz
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इसी
लिए
तो
है
ज़िंदाँ
को
जुस्तुजू
मेरी
कि
मुफ़लिसी
को
सिखाई
है
सर-कशी
मैं
ने
Ali Sardar Jafri
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भूख
है
तो
सब्र
कर,
रोटी
नहीं
तो
क्या
हुआ
आजकल
दिल्ली
में
है
ज़ेर-ए-बहस
ये
मुद्दआ
Dushyant Kumar
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न
तीर्थ
जा
कर
न
धर्म
ग्रंथो
का
सार
पा
कर
सुकूँ
मिला
है
मुझे
तो
बस
तेरा
प्यार
पा
कर
ग़रीब
बच्चे
किताब
पढ़
कर
सँवर
रहे
हैं
अमीर
लड़के
बिगड़
रहे
हैं
दुलार
पा
कर
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Alankrat Srivastava
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हम
जो
अपने
घर
में
खुलकर
रो
पड़े
सुनते
हीं
सारे
सितमगर
रो
पड़े
एक
मुद्दत
हो
चुकी
थी
बिन
मिले
मिलते
ही
भाई
सहोदर
रो
पड़े
देखकर
इक
वीर
की
बेवा
को
तो
हाथ
की
चूड़ी
महावर
रो
पड़े
चाक
दामन
इस
तरह
मेरा
हुआ
सीते
सीते
ही
रफ़ूगर
रो
पड़े
घर
मेरे
आए
हुए
मेहमान
सब
देखकर
के
टूटी
छप्पर
रो
पड़े
जिसको
पाने
के
लिए
रोते
थे
हम
जब
उसे
पाया
तो
पाकर
रो
पड़े
आदमी
को
आदमी
कैसे
कहें
देखकर
जिसको
पयम्बर
रो
पड़े
क्या
शिकायत
हो
ज़माने
भर
की
जब
सर
लगे
अपनों
के
पत्थर
रो
पड़े
नज़्म
ऐसी
थी
मियाँ
के
क्या
कहें
बज़्म
में
सारे
सुख़न-वर
रो
पड़े
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Kumar Aryan
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मीर
तख़ल्लुस
रख
लेने
से
मीर
कोई
हो
जाएगा
क्या
Kumar Aryan
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देख
मेरी
चाल
अच्छे
अच्छों
का
हाल
है
बेहाल
अच्छे
अच्छों
का
हम
गरीबों
से
ही
चलता
है
सुनो
पेट
का
जंजाल
अच्छे
अच्छों
का
वक़्त
से
बच
जाना
नामुमकिन
ही
है
वक़्त
हीं
है
काल
अच्छे
अच्छों
का
घर
चलाना
इतना
भी
आसाँ
नहीं
इस
में
बिगड़ा
हाल
अच्छे
अच्छों
का
मुफ़लिसों
के
वास्ते
है
इक
घुटन
हाल
है
ख़ुश
हाल
अच्छे
अच्छों
का
मैं
हीं
बेहतर
हूँ
सभी
से
यार
ये
रुतबा
है
पामाल
अच्छे
अच्छों
का
सत्य
ये
भी
जानता
हूँ
दोस्त
मैं
राम
है
जगपाल
अच्छे
अच्छों
का
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Kumar Aryan
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सैकड़ों
घर
थे
मगर
फुटपाथ
पे
सोया
था
मैं
जब
तुम्हारे
शहरस
लौटा
बहुत
रोया
था
मैं
Kumar Aryan
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आदमी
ये
क्यूँ
समझ
पाया
नहीं
ता
क़यामत
चलती
ये
काया
नहीं
क्या
हुआ
जो
यार
हँस
पाया
न
मैं
हाँ
मगर
ग़म
को
किया
जाया
नहीं
शह्र
तो
पहले
से
ही
वीरान
था
गाँव
में
भी
पेड़
की
छाया
नहीं
कैसे
चलता
होगा
उस
बच्चे
का
घर
जिसके
सर
पर
बाप
का
साया
नहीं
रो
पड़ी
ये
सोचकर
बीमार
माँ
देखने
बेटा
मेरा
आया
नहीं
राम
ने
मस्जिद
कोई
तोड़ी
नहीं
शैख
ने
मन्दिर
कोई
ढ़ाया
नहीं
बेच
देंगे
ये
लुटेरे
मुल्क
को
ये
हक़ीक़त
है
कोई
माया
नहीं
तान
छेड़ी
है
मुख़ालिफ़
ज़ुल्म
के
राग
दरबारी
कभी
गाया
नहीं
आधी
रोटी
खाई
पर
ईमान
की
बेचकर
ईमान
कुछ
खाया
नहीं
दार
पर
चढ़
जाऊँगा
सच
बोलकर
झूठ
का
चेहरा
मुझे
भाया
नहीं
हर
क़दम
पर
चोट
खाई
है
कुमार
मुँह
मगर
इक
दिन
भी
लटकाया
नहीं
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Kumar Aryan
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