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Kumar Aryan
aadmi ye kyuuñ samajh paaya nahin
aadmi ye kyuuñ samajh paaya nahin | आदमी ये क्यूँ समझ पाया नहीं
- Kumar Aryan
आदमी
ये
क्यूँ
समझ
पाया
नहीं
ता
क़यामत
चलती
ये
काया
नहीं
क्या
हुआ
जो
यार
हँस
पाया
न
मैं
हाँ
मगर
ग़म
को
किया
जाया
नहीं
शह्र
तो
पहले
से
ही
वीरान
था
गाँव
में
भी
पेड़
की
छाया
नहीं
कैसे
चलता
होगा
उस
बच्चे
का
घर
जिसके
सर
पर
बाप
का
साया
नहीं
रो
पड़ी
ये
सोचकर
बीमार
माँ
देखने
बेटा
मेरा
आया
नहीं
राम
ने
मस्जिद
कोई
तोड़ी
नहीं
शैख
ने
मन्दिर
कोई
ढ़ाया
नहीं
बेच
देंगे
ये
लुटेरे
मुल्क
को
ये
हक़ीक़त
है
कोई
माया
नहीं
तान
छेड़ी
है
मुख़ालिफ़
ज़ुल्म
के
राग
दरबारी
कभी
गाया
नहीं
आधी
रोटी
खाई
पर
ईमान
की
बेचकर
ईमान
कुछ
खाया
नहीं
दार
पर
चढ़
जाऊँगा
सच
बोलकर
झूठ
का
चेहरा
मुझे
भाया
नहीं
हर
क़दम
पर
चोट
खाई
है
कुमार
मुँह
मगर
इक
दिन
भी
लटकाया
नहीं
- Kumar Aryan
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उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी
से
अंजुम
सह
में
जाते
हैं
कि
ये
टूटा
हुआ
तारा
मह-ए-कामिल
न
बन
जाए
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Allama Iqbal
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आने
वाले
जाने
वाले
हर
ज़माने
के
लिए
आदमी
मज़दूर
है
राहें
बनाने
के
लिए
Hafeez Jalandhari
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इंसान
अपने
आप
में
मजबूर
है
बहुत
कोई
नहीं
है
बे-वफ़ा
अफ़्सोस
मत
करो
Bashir Badr
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मैं
तुझे
खो
के
भी
ज़िंदा
हूँ
ये
देखा
तूने
किस
क़दर
हौसला
हारे
हुए
इंसान
में
है
Abbas Tabish
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सुब्ह-ए-मग़रूर
को
वो
शाम
भी
कर
देता
है
शोहरतें
छीन
के
गुमनाम
भी
कर
देता
है
वक़्त
से
आँख
मिलाने
की
हिमाकत
न
करो
वक़्त
इंसान
को
नीलाम
भी
कर
देता
है
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Nadeem Farrukh
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अब
जो
पत्थर
है
आदमी
था
कभी
इस
को
कहते
हैं
इंतिज़ार
मियाँ
Afzal Khan
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शबो
रोज़
की
चाकरी
ज़िन्दगी
की
मुयस्सर
हुईं
रोटियाँ
दो
घड़ी
की
नहीं
काम
आएँ
जो
इक
दिन
मशीनें
ज़रूरत
बने
आदमी
आदमी
की
कि
कल
शाम
फ़ुरसत
में
आई
उदासी
बता
दी
मुझे
क़ीमतें
हर
ख़ुशी
की
किया
क्या
अमन
जी
ने
बाइस
बरस
में
कभी
जी
लिया
तो
कभी
ख़ुद-कुशी
की
ग़मों
को
ठिकाने
लगाते
लगाते
घड़ी
आ
गई
आदमी
के
ग़मी
की
ये
सारी
तपस्या
का
कारण
यही
है
मिसालें
बनें
तो
बनें
सादगी
की
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Aman G Mishra
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संग-ए-मरमर
की
मूरत
नहीं
आदमी
इस
क़दर
ख़ूब-सूरत
नहीं
आदमी
चंद
क़िस्सों
की
दरकार
है
बस
इसे
आदमी
की
ज़रूरत
नहीं
आदमी
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anupam shah
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हर
आदमी
में
होते
हैं
दस
बीस
आदमी
जिस
को
भी
देखना
हो
कई
बार
देखना
Nida Fazli
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इंसाँ
की
ख़्वाहिशों
की
कोई
इंतिहा
नहीं
दो
गज़
ज़मीं
भी
चाहिए
दो
गज़
कफ़न
के
बाद
Kaifi Azmi
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मुहब्बत
का
यूँँ
ही
जादू
चलाते
चला
जाएगा
वो
हँसते-हँसाते
तुम्हारे
कितने
हैं
एहसान
हम
पर
कभी
तो
हम
तुम्हारे
काम
आते
अगर
तुम
मिल
गए
होते
क़सम
से
सितारों
की
तरह
हम
जगमगाते
यहाँ
अब
अपने
भी
हैं
ग़ैर
जैसे
बताओ
दर्द
हम
किसको
सुनाते
हमें
लूटा
है
दस्त-ए-वक़्त
ने
यूँँ
बचा
ही
क्या
है
जो
अब
हम
गँवाते
अता
की
है
मुक़द्दर
ने
फ़क़ीरी
कहाँ
से
हम
भला
दौलत
लुटाते
बड़े
बेटे
थे
अपने
घर
के
साहब
चलाते
घर
के
हम
दिल
को
लगाते
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Kumar Aryan
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बेटा
तो
डॉक्टर
है
बड़ा
नामी
शहर
में
और
बाप
चल
बसा
है
कमी
से
इलाज
की
Kumar Aryan
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आख़िर
प्यार
रहेगा
कब
तक
मरते
दम
तक
या
मतलब
तक
आँखों
ने
सब
कुछ
कह
डाला
बात
नहीं
आई
बस
लब
तक
इश्क़
तो
मुद्दत
से
जारी
है
आज
ख़बर
पहुँची
साहब
तक
पंडित
मुल्ला
और
भिकारी
बेच
रहे
हैं
सब
मज़हब
तक
कैसे-कैसे
चोर
उचक्के
आ
पहुँचे
हैं
बज़्म-ए-अदब
तक
ज़ुल्म
न
ऐसे
हरगिज़
ढाओ
बात
चली
जायेगी
रब
तक
तब
तक
हम
भी
प्यार
करेंगे
नील
गगन
क़ायम
है
जब
तक
आह
गरीबों
की
मत
लेना
ले
डूबेगी
ये
साहब
तक
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Kumar Aryan
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अब
तो
बे-ईमान
ख़ुश
हो
बन
गए
सुलतान
ख़ुश
हो
कर
लिया
सौदा
क़लम
का
बेचकर
ईमान
ख़ुश
हो
राग
दरबारी
सुनाकर
हो
गए
दरबान
ख़ुश
हो
तुम
तो
थे
सच्चे
सिपाही
छोड़कर
मैदान
ख़ुश
हो
मेरी
ग़ैरत
मर
गई
है
कर
के
ये
एहसान
ख़ुश
हो
छीन
कर
अधिकार
मेरा
हो
गए
धनवान
ख़ुश
हो
चल
गई
मर्ज़ी
तुम्हारी
अब
तो
मेरी
जान
ख़ुश
हो
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Kumar Aryan
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है
कौन
अपना
पराया
हिसाब
रखते
हैं
तेरे
सवाल
का
हम
भी
जवाब
रखते
हैं
मियाँ
हमें
नहीं
मालूम
कौन
क्या
देगा
मगर
सभी
के
लिए
हम
गुलाब
रखते
हैं
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Kumar Aryan
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